US-ईरान टेंशन बढ़ा तो किस सेक्टर पर पड़ेगा सबसे ज्यादा असर? शेयर बाजार और महंगाई पर होगा कितना असर, एक्सपर्ट से समझें पूरी बात
US Iran war tension: पश्चिम एशिया में अमेरिका और ईरान के बीच एक बार फिर टेंशन बढ़ने से वैश्विक बाजारों की नजरें कच्चे तेल और जियोपॉलिटिकल घटनाक्रम पर टिक गई हैं। हालांकि, हालिया सैन्य कार्रवाई के बाद निवेशकों में शुरुआती चिंता जरूर दिखी, लेकिन शेयर बाजारों में घबराहट सीमित रही। सवाल यह है कि अगर यह तनाव और बढ़ता है तो सबसे ज्यादा नुकसान किसे होगा? क्या भारत की इकोनॉमी और शेयर मार्केट पर इसका बड़ा असर पड़ेगा? इन सवालों पर दूरदर्शी इंडिया फंड, न्यूयॉर्क के फाउंडर राजीव अग्रवाल ने विस्तार से अपनी राय रखी।
क्या बड़े युद्ध की ओर बढ़ रहा है मिडिल ईस्ट?
राजीव अग्रवाल का मानना है कि मौजूदा हालात को सीधे बड़े युद्ध की शुरुआत कहना जल्दबाजी होगी। उनके मुताबिक अमेरिका और ईरान के बीच भरोसे की कमी जरूर है, लेकिन दोनों देश फिलहाल अपनी रणनीतिक स्थिति मजबूत करने की कोशिश कर रहे हैं। उनका कहना है कि न अमेरिका लंबा युद्ध चाहता है और न ही ईरान। ऐसे में मौजूदा तनाव को शॉर्ट टर्म पोजिशनिंग के तौर पर देखा जाना चाहिए और समय के साथ हालात सामान्य होने की उम्मीद है।
क्या 85 डॉलर के पार जा सकता है कच्चा तेल?
टेंशन बढ़ने के बाद सबसे बड़ी चिंता कच्चे तेल की कीमतों को लेकर है। हालांकि राजीव अग्रवाल का कहना है कि इस बार स्थिति पहले जैसी नहीं है। युद्धविराम के दौरान बड़ी संख्या में ऑयल टैंकर पहले ही हॉरमुज जलडमरूमध्य से निकल चुके हैं, जिससे वैश्विक सप्लाई पर तत्काल बड़ा दबाव नहीं है।
उनके अनुसार यदि कुछ दिनों या कुछ हफ्तों तक व्यवधान रहता है तो इसका असर ज्यादा भावनात्मक यानी सेंटीमेंट आधारित होगा, न कि वास्तविक सप्लाई पर। हालांकि यदि यह संकट कई महीनों तक जारी रहता है तो ब्रेंट क्रूड 85 से 90 डॉलर प्रति बैरल तक भी जा सकता है, जिससे पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था प्रभावित होगी।
भारत के लिए कितनी बड़ी चुनौती?
भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा कच्चा तेल आयात करता है। ऐसे में तेल की कीमतों में तेज बढ़ोतरी सीधे महंगाई, रुपये और कंपनियों की लागत पर असर डाल सकती है। हालांकि राजीव अग्रवाल का मानना है कि फिलहाल ऑयल मार्केट में सप्लाई पर्याप्त है और ओपेक प्लस द्वारा उत्पादन बढ़ाने का फैसला भी बाजार को सहारा दे रहा है।
उनके मुताबिक अगर तनाव लंबे समय तक नहीं चलता तो भारत पर इसका असर सीमित रहेगा। लेकिन अगर संकट लंबा खिंचता है तो आयात बिल बढ़ सकता है और महंगाई फिर से दबाव बना सकती है।
ये भी पढ़ें: कमाई का सीजन शुरू, लेकिन 40 से अधिक कंपनियों पर ब्रोकरेज अलर्ट! Airtel से Trent तक किसका कितना घट सकता है मुनाफा?
शेयर बाजार क्यों नहीं घबराया?
दिलचस्प बात यह है कि हालिया घटनाक्रम के बावजूद अमेरिकी और एशियाई शेयर बाजारों में बड़ी बिकवाली नहीं दिखी। राजीव अग्रवाल के अनुसार बाजार फिलहाल यही मानकर चल रहा है कि यह तनाव ज्यादा लंबा नहीं चलेगा।
उनका कहना है कि निवेशकों को भरोसा है कि दोनों देशों के लिए लंबा युद्ध फायदे का सौदा नहीं है। अमेरिका में आने वाले मिड-टर्म चुनाव और ईरान की आंतरिक चुनौतियां भी इस बात की ओर इशारा करती हैं कि दोनों पक्ष तनाव को अनिश्चित काल तक नहीं बढ़ाना चाहेंगे।
अगले छह महीने पर क्या है एक्सपर्ट की राय?
राजीव अग्रवाल का मानना है कि आने वाले पांच से छह महीनों में वैश्विक तेल बाजार अपेक्षाकृत संतुलित रह सकता है। उन्होंने कहा कि हाल ही में युद्धविराम के बाद कच्चे तेल की कीमतें उम्मीद से कहीं तेजी से नीचे आई थीं, जिससे साफ संकेत मिलता है कि वैश्विक बाजार में फिलहाल सप्लाई की कमी नहीं है।
ये भी पढ़ें: SBI AMC IPO: सिर्फ 15 पैसे के दांव से SBI कमा लेगा 7,366.39 करोड़ रुपये, कैसे आईपीओ भर रहा सरकारी बैंक की तिजोरी
उनके मुताबिक अगर तनाव धीरे-धीरे कम होता है तो तेल की कीमतों में फिर से नरमी आ सकती है। इससे दुनिया भर में महंगाई पर दबाव घटेगा और शेयर बाजारों के लिए भी माहौल बेहतर हो सकता है।
Disclaimer: ये आर्टिकल सिर्फ जानकारी के लिए है और इसे किसी भी तरह से इंवेस्टमेंट सलाह के रूप में नहीं माना जाना चाहिए। ET NOW Swadesh अपने पाठकों और दर्शकों को पैसों से जुड़ा कोई भी फैसला लेने से पहले अपने वित्तीय सलाहकारों से सलाह लेने का सुझाव देता है।

Leave a Reply