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भारत को यूरेनियम सप्लाई करेगा ऑस्ट्रेलिया, दोनों देशों के बीच हुई डील क्यों है इतना अहम
भारत को यूरेनियम सप्लाई करेगा ऑस्ट्रेलिया, दोनों देशों के बीच हुई डील क्यों है इतना अहम

भारत को यूरेनियम सप्लाई करेगा ऑस्ट्रेलिया, दोनों देशों के बीच हुई डील क्यों है इतना अहम

भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच गुरुवार को यूरेनियम डील पर मुहर लग गई है। मेलबर्न में पीएम मोदी और ऑस्ट्रेलियाई पीएम एंथनी अल्बनीज ने मीटिंग के बाद जॉइंट प्रेस कॉन्फ्रेंस में समझौते का ऐलान हुआ है। इसके तहत अब ऑस्ट्रेलिया भारत को शांतिपूर्ण नागरिक न्यूक्लियर प्रोग्राम के लिए यूरेनियम की कमर्शियल सप्लाई कर सकेगा। इस फैसले के साथ करीब दस साल से लंबित प्रक्रिया पूरी हो गई है। इस बड़े फैसले की घोषणा मेलबर्न में आयोजित तीसरे भारत-ऑस्ट्रेलिया वार्षिक शिखर सम्मेलन के दौरान की गई।

यह समझौता दोनों देशों के बीच ऊर्जा क्षेत्र में नई साझेदारी की शुरुआत माना जा रहा है। ऑस्ट्रेलिया दुनिया के सबसे बड़े यूरेनियम भंडार वाले देशों में शामिल है, जबकि भारत दुनिया के सबसे तेजी से बढ़ते ऊर्जा बाजारों में से एक है। ऐसे में यह समझौता भारत की भविष्य की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने में अहम भूमिका निभा सकता है।

यूरेनियम डील पर भारत-ऑस्ट्रेलिया ने जताई खुशी

समझौता लागू होने के बाद ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री एंथनी अल्बनीज ने कहा कि भारत और ऑस्ट्रेलिया के रिश्ते भरोसे और साझा हितों पर आधारित हैं। उन्होंने कहा, “भारत और ऑस्ट्रेलिया सिर्फ अच्छे साझेदार ही नहीं, बल्कि बेहद करीबी दोस्त भी हैं।” अल्बनीज ने बताया कि इस समझौते से ऑस्ट्रेलिया से भारत को यूरेनियम की आपूर्ति आसान होगी। इससे भारत को स्वच्छ और गैर-जीवाश्म ईंधन से बिजली उत्पादन बढ़ाने में मदद मिलेगी। साथ ही ऑस्ट्रेलिया के संसाधन क्षेत्र को भी एक नया और बड़ा बाजार मिलेगा।

वहीं, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि यह समझौता दोनों देशों के लिए कई नए आर्थिक अवसर लेकर आएगा। उन्होंने कहा कि भारत और ऑस्ट्रेलिया के पास ऊर्जा समेत कई क्षेत्रों में साथ मिलकर काम करने का सुनहरा मौका है। प्रधानमंत्री ने ऑस्ट्रेलियाई कंपनियों से भारत के बुनियादी ढांचा (इन्फ्रास्ट्रक्चर) क्षेत्र में अधिक निवेश करने का भी आग्रह किया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि भारत निवेश के लिए एक सुरक्षित, स्थिर और लंबे समय तक बेहतर विकास वाला देश है। उन्होंने ऑस्ट्रेलियाई निवेशकों से भारत में ज्यादा निवेश करने की अपील की।

ये डीस क्यों है खास?

भारत और ऑस्ट्रेलिया ने 2014-15 में नागरिक परमाणु सहयोग समझौते पर हस्ताक्षर किए थे। लेकिन इसके बाद भी भारत को ऑस्ट्रेलिया से यूरेनियम की आपूर्ति शुरू नहीं हो सकी थी। इसकी वजह यह थी कि दोनों देशों ने व्यावसायिक यूरेनियम आपूर्ति के लिए जरूरी प्रशासनिक और सुरक्षा प्रक्रियाएं पूरी नहीं की थीं।

ऑस्ट्रेलिया परमाणु अप्रसार संधि (NPT) का सदस्य है। इसलिए वहां से यूरेनियम का निर्यात कड़े नियमों और अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा मानकों के तहत ही किया जाता है। अब सभी जरूरी प्रक्रियाएं पूरी होने के बाद भारत को ऑस्ट्रेलिया से यूरेनियम की आपूर्ति का रास्ता साफ हो गया है।

IAEA की निगरानी में होगा यूरेनियम का इस्तेमाल

भारत परमाणु अप्रसार संधि (NPT) का सदस्य नहीं है, लेकिन उसने अपने नागरिक परमाणु संयंत्रों के लिए अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) के सुरक्षा नियमों को स्वीकार किया है। नए समझौते के तहत एक ऐसी निगरानी और सत्यापन व्यवस्था बनाई गई है, जिससे यह सुनिश्चित किया जाएगा कि ऑस्ट्रेलिया से मिलने वाला यूरेनियम केवल भारत के नागरिक परमाणु कार्यक्रम में ही इस्तेमाल हो। समझौते के अनुसार, ऑस्ट्रेलिया से आने वाले सभी यूरेनियम की आपूर्ति IAEA की निगरानी में होगी। एजेंसी यह सुनिश्चित करेगी कि इस यूरेनियम का उपयोग केवल शांतिपूर्ण उद्देश्यों और बिजली उत्पादन के लिए ही किया जाए।

भारत को ऑस्ट्रेलिया से यूरेनियम की जरूरत क्यों है?

भारत ने स्वच्छ ऊर्जा को बढ़ावा देने के लिए 2047 तक 100 गीगावाट परमाणु ऊर्जा क्षमता हासिल करने का लक्ष्य रखा है। इस लक्ष्य को पूरा करने के लिए देश को यूरेनियम की लगातार और भरोसेमंद आपूर्ति की जरूरत होगी। हालांकि, भारत के पास दुनिया के सबसे बड़े थोरियम भंडार में से एक है, लेकिन यूरेनियम का घरेलू भंडार सीमित है। यही वजह है कि परमाणु बिजली परियोजनाओं के लिए भारत को दूसरे देशों से यूरेनियम आयात करना पड़ता है। फिलहाल भारत में बनने वाली करीब 75 प्रतिशत बिजली अभी भी कोयले से तैयार होती है। वहीं, सौर और पवन ऊर्जा जैसे नवीकरणीय स्रोत पर्यावरण के लिए बेहतर हैं, लेकिन ये हर समय लगातार बिजली नहीं दे सकते। ऐसे में परमाणु ऊर्जा को भविष्य की स्वच्छ और भरोसेमंद बिजली का महत्वपूर्ण स्रोत माना जा रहा है।

परमाणु ऊर्जा से मिलेगा स्वच्छ और भरोसेमंद बिजली उत्पादन

परमाणु ऊर्जा को कम कार्बन उत्सर्जन वाला और लगातार बिजली देने वाला ऊर्जा स्रोत माना जाता है। यही वजह है कि 2070 तक नेट-ज़ीरो कार्बन उत्सर्जन का लक्ष्य हासिल करने की भारत की योजना में परमाणु ऊर्जा की अहम भूमिका है। ऑस्ट्रेलिया से मिलने वाला यूरेनियम भारत के तीन चरणों वाले परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम को भी मजबूती देगा। इस योजना के तहत पहले यूरेनियम आधारित परमाणु रिएक्टरों का इस्तेमाल किया जाएगा। इसके बाद भविष्य में भारत अपने विशाल थोरियम भंडार का उपयोग कर परमाणु ऊर्जा उत्पादन को और बढ़ाएगा।

भारत तेजी से बढ़ा रहा है परमाणु ऊर्जा क्षमता

भारत इस समय देश के 7 स्थानों पर 24 परमाणु रिएक्टर चला रहा है। इनकी कुल बिजली उत्पादन क्षमता 8.78 गीगावाट (GW) है। फिलहाल देश के कुल बिजली उत्पादन में परमाणु ऊर्जा की हिस्सेदारी करीब 3.1 प्रतिशत है। हालांकि, कई नए परमाणु रिएक्टरों का निर्माण जारी है। सरकार को उम्मीद है कि 2031-32 तक यह क्षमता बढ़कर करीब 22 गीगावाट हो जाएगी। सरकार का लक्ष्य 2047 तक परमाणु ऊर्जा उत्पादन क्षमता को 100 गीगावाट तक पहुंचाना है, ताकि देश की बढ़ती बिजली जरूरतों को स्वच्छ ऊर्जा से पूरा किया जा सके। इस दिशा में भारत ने हाल ही में एक बड़ी उपलब्धि भी हासिल की है। कलपक्कम में बने 500 मेगावाट क्षमता वाले प्रोटोटाइप फास्ट ब्रीडर रिएक्टर ने पहली बार सफल नियंत्रित परमाणु फर्स्ट क्रिटिकलिटी हासिल की है। इसे भारत के तीन चरणों वाले परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम के दूसरे चरण की बड़ी सफलता माना जा रहा है।

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