Lab Made Gold: सोना भी लैब में बना चुके हैं वैज्ञानिक, लेकिन बनाने का खर्च जानकर उड़ जाएंगे होश
Lab Made Gold: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जनता से अपील की है कि वो 1 साल तक सोना न खरीदे। इसका मकसद विदेशी मुद्रा है, जो सोना खरीदने में काफी ज्यादा खर्च होती है। सरकार ने सोने और चांदी के आयात पर इंपोर्ट ड्यूटी भी 6 से बढ़ाकर 15 फीसदी कर दी है।
ऐसे में सवाल उठता है कि क्या कोई ऐसा विकल्प नहीं है, जिससे हमें सोना आयात करने की जरूरत ही न पड़े। जैसे कि लैब में सोना बनाना। वैज्ञानिक नजरिये से ये मुमकिन भी है। आज दुनिया में लैब में हीरा बनाया जा रहा है। यह कोई नकली पत्थर नहीं, बल्कि असली डायमंड होता है। इसकी चमक, मजबूती और केमिकल संरचना तक प्राकृतिक हीरे जैसी होती है।
अब सवाल है कि अगर इंसान लैब में हीरा बना सकता है, तो क्या सोना भी बनाया जा सकता है? और अगर बनाया जा सकता है, तो फिर दुनिया भर की लैब्स टन के हिसाब से सोना क्यों नहीं बना रहीं? असल में इसका जवाब साइंस, टेक्नोलॉजी और पैसे तीनों से जुड़ा है। लेकिन, पहले समझ लेते हैं कि लैब में सोना बनने के क्या फायदे होंगे।
लैब में सोना बनने के फायदे
अगर हीरे की तरह लैब में बड़े पैमाने पर सोना बनाना मुमकिन हो गया, तो इसका असर पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था और टेक्नोलॉजी पर पड़ेगा। सोने की सप्लाई बढ़ जाएगी और कीमतें कम हो जाएंगी। ज्वेलरी, इलेक्ट्रॉनिक्स, मोबाइल चिप, मेडिकल उपकरण और स्पेस टेक्नोलॉजी जैसी इंडस्ट्रीज को सस्ता सोना मिलने लगेगा।
इसका एक बड़ा फायदा यह भी होगा कि सोने की खदानों में होने वाली भारी खुदाई, पर्यावरण को होने वाला नुकसान और अवैध माइनिंग जैसी समस्याएं कम हो सकती हैं।
हीरा और सोने में सबसे बड़ा फर्क क्या है?
हीरा और सोना दिखने में भले कीमती लगते हों, लेकिन साइंस में दोनों बिल्कुल अलग चीजें हैं। हीरा सिर्फ कार्बन का एक रूप है। यानी वही कार्बन, जो कोयले में होता है, सही तापमान और दबाव मिलने पर हीरे की शक्ल ले सकता है।
इसी वजह से वैज्ञानिक लैब में कार्बन एटम्स को कंट्रोल करके डायमंड तैयार कर लेते हैं। लेकिन सोना किसी कंपाउंड का नाम नहीं है। वह खुद एक एलिमेंट है। उसके हर एटम में 79 प्रोटॉन होते हैं। यही उसकी असली पहचान है।
क्या वैज्ञानिक लैब में सोना बना चुके हैं?
जवाब है हां, वैज्ञानिक सोना बना चुके हैं। न्यूक्लियर रिएक्शन की मदद से दूसरे एलिमेंट्स को बदलकर सोना तैयार किया गया है। उदाहरण के लिए, पारे यानी मरकरी के एटम में बदलाव करके उसे गोल्ड में बदला जा सकता है।
लेकिन यह काम किसी सामान्य लैब में नहीं होता। इसके लिए न्यूक्लियर रिएक्टर या पार्टिकल एक्सेलरेटर जैसी बेहद एडवांस मशीनें चाहिए होती हैं।
लैब में पहली बार गोल्ड कैसे बना था
लैब में पहली बार सोना 1941 में अमेरिका के वैज्ञानिकों ने बनाया था। हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के फिजिसिस्टों ने मरकरी यानी पारे के एटम पर न्यूट्रॉन बॉम्बार्डमेंट का प्रयोग किया। इसमें पारे के एटम पर न्यूट्रॉन दागे गए, जिससे उसके न्यूक्लियस की संरचना बदल गई। जब मरकरी के एटम से कुछ प्रोटॉन और न्यूट्रॉन का संतुलन बदला, तो वह गोल्ड के एटम में बदल गया।
यह अपने समय का बेहद बड़ा वैज्ञानिक प्रयोग माना गया, क्योंकि पहली बार इंसान ने किसी एक एलिमेंट को दूसरे एलिमेंट में बदला था। हालांकि इसमें जो सोना बना, उसकी मात्रा बेहद छोटी थी। कई बार सिर्फ कुछ एटम तक। उसे निकालना, जमा करना या ज्वेलरी की तरह इस्तेमाल करना मुमकिन ही नहीं था।
लैब में गोल्ड बनाने में दिक्कत क्या है?
सबसे बड़ी मुश्किल एटम की पहचान बदलने में आती है। हीरा बनाने में सिर्फ कार्बन एटम्स की संरचना बदली जाती है। लेकिन सोना बनाने के लिए एटम के न्यूक्लियस से छेड़छाड़ करनी पड़ती है। यानी उसके प्रोटॉन की संख्या बदलनी पड़ती है। यह प्रक्रिया बेहद कठिन, महंगी और खतरनाक होती है।
दूसरी दिक्कत यह है कि लैब में बना सोना बहुत कम मात्रा में तैयार होता है। कई बार सिर्फ कुछ एटम या माइक्रोस्कोपिक स्तर तक। जैसा कि 1941 के प्रयोग में हुआ था। ऐसे सोने को निकालना और इस्तेमाल लायक बनाना लगभग नामुमकिन जैसा होता है।
कितना महंगा है लैब में सोना बनाना
आज बाजार में 10 ग्राम सोना करीब 1.60 लाख रुपये का है। मतलब कि 1 ग्राम सोने की कीमत लगभग 16,000 रुपये बैठती है। लेकिन लैब में न्यूक्लियर तकनीक से सिर्फ 1 ग्राम सोना बनाने की कोशिश करें, तो उसका खर्च लाखों नहीं, बल्कि करोड़ों या अरबों रुपये तक पहुंच सकता है।
कारण यह है कि सोना बनाने के लिए साधारण केमिकल प्रोसेस नहीं, बल्कि पार्टिकल एक्सेलरेटर या न्यूक्लियर रिएक्टर जैसी मशीनें चाहिए होती हैं। दुनिया के बड़े पार्टिकल एक्सेलरेटर हर साल हजारों करोड़ रुपये की बिजली और मेंटेनेंस खर्च करते हैं। कुछ एक्सेलरेटर इतने बिजली खाते हैं कि उनसे एक छोटा शहर चल सकता है।
फिर सोना बनाना फायदे का सौदा क्यों नहीं?
बेशक लैब में सोना बनाना मुमकिन है, लेकिन आर्थिक रूप से यह पूरी तरह घाटे का काम है। जिस सोने को बनाने में अरबों रुपये खर्च हो जाएं, उसे बाजार में बेचकर मुनाफा नहीं कमाया जा सकता। जमीन से सोना निकालना आज भी इससे कहीं ज्यादा सस्ता पड़ता है।
यही वजह है कि दुनिया की सबसे एडवांस लैब्स भी बड़े पैमाने पर सोना बनाने की कोशिश नहीं करतीं। उनका फोकस सोने की खोज, रीसाइक्लिंग और नई टेक्नोलॉजी पर ज्यादा रहता है।
फिर आखिर सोना बना कैसे है?
वैज्ञानिकों के मुताबिक, धरती का ज्यादातर सोना यहां बना ही नहीं था। माना जाता है कि सोना सुपरनोवा विस्फोट और न्यूट्रॉन स्टार्स की टक्कर जैसी अंतरिक्ष की बड़ी घटनाओं में बना था। इसका मतलब है कि आपकी अंगूठी या गले की चेन कभी किसी टूटते या फटते तारे का हिस्सा रहा होगा।
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