Retirement Planning: रिटायरमेंट पर मिले 60 लाख, सारा पैसा एक बास्केट में रखने की बजाय ऐसे करें प्लान, रेगुलर इनकम के साथ इमरजेंसी फंड भी रहेगा तैयार
Retirement Planning : नौकरी के दौरान हर महीने सैलरी खाते में आती है तो भविष्य की चिंता कुछ कम रहती है। लेकिन रिटायरमेंट के साथ यह नियमित आय रुक जाती है और तब बैंक खाते में जमा रकम ही अगले कई सालों के खर्च का सहारा बनती है। मान लीजिए रिटायरमेंट पर आपको 60 लाख रुपये मिले हैं। एक पल के लिए यह रकम बड़ी जरूर लग सकती है, लेकिन अगर बिना प्लानिंग इस पूरी रकम को एक ही जगह लगा दी या सिर्फ ज्यादा रिटर्न के पीछे भागे, तो बढ़ती उम्र के साथ वित्तीय दबाव बढ़ सकता है।
रिटायरमेंट के बाद निवेश का मतलब सिर्फ यह नहीं होना चाहिए कि पैसा सबसे तेजी से कहां बढ़ेगा। असली सवाल यह है कि हर महीने घर का खर्च कहां से निकलेगा, अचानक बड़ा खर्च आ गया तो पैसा कहां से आएगा और 10-15 साल बाद महंगाई के बीच आपकी बचत कितनी काम आएगी। इन्हीं जरूरतों को ध्यान में रखते हुए 60 लाख रुपये को अलग-अलग हिस्सों में बांटकर एक संतुलित रणनीति बनाई जा सकती है।
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60 लाख रुपये को एक बास्केट में रखने के बजाय ऐसे बांटें
एक उदाहरण के तौर पर 60 लाख रुपये को चार हिस्सों में बांटने की रणनीति कुछ इस तरह हो सकती है:
- जरूरत – हिस्सा – रकम
- इमरजेंसी फंड – 20% – 12 लाख
- रेगुलर इनकम – 40% – 24 लाख
- लॉन्ग टर्म ग्रोथ – 30% – 18 लाख
- कैश – 10% – 6 लाख
- कुल – 100% – 60 लाख
यह बंटवारा एक उदाहरण है, कोई फिक्स फॉर्मूला नहीं। हर व्यक्ति का रिटायरमेंट पोर्टफोलियो उसकी उम्र, पेंशन, मासिक खर्च, दूसरे निवेश, जोखिम उठाने की क्षमता, स्वास्थ्य जरूरतों और टैक्स स्थिति के आधार पर अलग हो सकता है।
सबसे पहले तय करें- महीने का खर्च कितना है?
रिटायरमेंट प्लानिंग की शुरुआत रिटर्न से नहीं, खर्च से होनी चाहिए। मान लीजिए रिटायरमेंट के बाद आपका मंथली खर्च 40,000 रुपये है। यानी सालभर में आपको करीब ₹40,000 × 12 = ₹4.8 लाख की जरूरत होगी। अब इसमें बिजली-पानी, राशन और दूसरी रोजमर्रा की जरूरतों के साथ स्वास्थ्य खर्च, बीमा प्रीमियम, यात्रा, घर की मरम्मत और अचानक आने वाले खर्चों को भी जोड़कर वास्तविक सालाना जरूरत निकालनी चाहिए। यही आंकड़ा तय करेगा कि आपके रिटायरमेंट कॉर्पस का कितना हिस्सा आसानी से उपलब्ध रखना है और कितना लंबे समय के लिए निवेश किया जा सकता है।
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12-18 महीने का खर्च अलग रखना क्यों जरूरी?
रिटायरमेंट के बाद 12-18 महीने के जरूरी खर्च के बराबर रकम ऐसी जगह रखना समझदारी हो सकती है, जहां जरूरत पड़ने पर आसानी से पैसा मिल जाए। अगर आपका जरूरी मंथली खर्च 40,000 रुपये है, तो 12-18 महीने का खर्च 4.8 लाख से करीब 7.2 लाख रुपये के बीच होगा। इस फंड का मकसद ज्यादा रिटर्न कमाना नहीं, बल्कि मुश्किल समय में निवेश बेचने से बचना है।
बाजार गिरा तो रिटायरमेंट फंड पर क्या असर होगा?
मान लीजिए किसी व्यक्ति ने रिटायरमेंट के पूरे 60 लाख रुपये शेयर बाजार में लगा दिए। बाजार में अचानक 20 फीसदी की गिरावट आती है तो निवेश का मूल्य करीब 48 लाख रुपये रह सकता है। अब अगर उसी समय घर चलाने के लिए पैसों की जरूरत पड़ जाए और बाजार गिरा हुआ हो, तो उसे नुकसान के बावजूद अपने निवेश का कुछ हिस्सा बेचना पड़ सकता है। यहीं पर अलग-अलग जरूरतों के लिए अलग-अलग पैसा रखने की रणनीति काम आती है। इमरजेंसी और निकट अवधि के खर्च के लिए अलग रकम होने पर बाजार की खराब स्थिति में इक्विटी निवेश को छेड़ने की जरूरत कम हो सकती है।
40 फीसदी पैसा रेगुलर इनकम के लिए
60 लाख रुपये का 40 फीसदी यानी 24 लाख रुपये होता है। इस रकम को नियमित आय के लिए अपेक्षाकृत सुरक्षित और नियमित आय देने वाले विकल्पों में लगाने पर विचार किया जा सकता है। हालांकि, किसी भी योजना को चुनने से पहले उसकी ब्याज दर, निवेश अवधि, निकासी के नियम, टैक्स और जोखिम को समझना जरूरी है। सिर्फ ज्यादा ब्याज देखकर निवेश करना सही रणनीति नहीं है। यह देखना ज्यादा जरूरी है कि निवेश से मिलने वाली आय आपके वास्तविक मासिक खर्च को कितनी हद तक पूरा कर पाएगी। अगर रिटायरमेंट के बाद आप अपनी बचत पर ज्यादा जोखिम नहीं लेना चाहते हैं, तो नियमित आय के लिए पोस्ट ऑफिस मंथली इनकम स्कीम (MIS) और सीनियर सिटीजन सेविंग्स स्कीम (SCSS) जैसे विकल्पों पर विचार किया जा सकता है। हालांकि, निवेश से पहले इन योजनाओं की मौजूदा ब्याज दर, निवेश सीमा, अवधि और टैक्स नियम जरूर जांच लें।
महंगाई के लिए भी पैसा बचाएं
रिटायरमेंट प्लानिंग में महंगाई को नजरअंदाज करना भारी पड़ सकता है। आज अगर 40,000 रुपये महीने में घर चल रहा है, तो जरूरी नहीं कि 10 साल बाद भी इतनी ही रकम में वही जरूरतें पूरी हों। इलाज, दवाइयों, किराने और दूसरी सेवाओं की लागत बढ़ सकती है। इसलिए रिटायरमेंट की पूरी रकम को सिर्फ सुरक्षित लेकिन कम रिटर्न वाले विकल्पों में रखना लंबे समय में पर्याप्त नहीं हो सकता। जिस रकम की अगले 7-10 साल तक जरूरत नहीं है, उसके एक हिस्से को लंबी अवधि की ग्रोथ के लिए विविध इक्विटी निवेश में रखने पर विचार किया जा सकता है। मसलन, 60 लाख रुपये के रिटायरमेंट फंड में से 30 फीसदी यानी 18 लाख रुपये लंबी अवधि की वृद्धि के लिए निवेश किए जा सकते हैं। हालांकि, इक्विटी में कितना पैसा लगाना है, यह व्यक्ति की उम्र, जोखिम लेने की क्षमता, दूसरी आय और वित्तीय जरूरतों पर निर्भर करेगा। ध्यान रखें, इक्विटी निवेश बाजार जोखिम के अधीन है, इसमें रिटर्न की कोई गारंटी नहीं होती और बाजार गिरने पर पूंजी घट भी सकती है।
नकदी का छोटा हिस्सा भी जरूरी
रिटायरमेंट पोर्टफोलियो में कुछ रकम नकदी या आसानी से निकाले जा सकने वाले विकल्पों में रखना भी जरूरी है, ताकि छोटी अवधि की जरूरत या अचानक आए खर्च के लिए लंबी अवधि के निवेश को तोड़ना न पड़े। ऊपर दिए उदाहरण में 6 लाख रुपये यानी कुल 60 लाख रुपये का 10 फीसदी नकदी के लिए रखा गया है। हालांकि, जरूरत से ज्यादा रकम लंबे समय तक सिर्फ सेविंग अकाउंट में रखने पर महंगाई के कारण उसकी वास्तविक क्रय शक्ति घट सकती है। इसलिए नकदी की मात्रा व्यक्ति के मासिक खर्च, इमरजेंसी फंड और अन्य आय के स्रोतों को ध्यान में रखकर तय करनी चाहिए।
(Disclaimer: यह आर्टिकल सिर्फ जानकारी के लिए है, न कि निवेश की सलाह है। यह ET NOW Swadesh के निजी विचार भी नहीं हैं। अपने पाठकों और दर्शकों को ET NOW Swadesh पैसों से जुड़ा कोई भी फैसला लेने से पहले अपने वित्तीय सलाहकारों से सलाह लेने का सुझाव देता है।)

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