कोलकाता एयरपोर्ट के अंदर कैसे पहुंची मस्जिद? अब यहां एंट्री पर लगी रोक…जानें बांकड़ा मस्जिद का पूरा इतिहास
कोलकाता के नेताजी सुभाष चंद्र बोस अंतरराष्ट्रीय एयरपोर्ट के भीतर स्थित 130 साल पुरानी गौरीपुर जामा मस्जिद (बांकड़ा मस्जिद) एक बार फिर चर्चा के केंद्र में है। एयरपोर्ट प्रशासन ने मस्जिद में आने वाले लोगों के एंट्री पास पर रोक लगा दी है और फिलहाल वहां नमाज भी बंद करा दी गई है। वजह है एयरपोर्ट के दूसरे रनवे का विस्तार और उससे जुड़े सुरक्षा मानक। वहीं इस मस्जिद के चर्चा में आने के बाद एक बार फि ये सवाल उठ रहे हैं कि, आखिर एक इंटरनेशनल एयरपोर्ट के हाई सिक्योरिटी जोन के भीतर मस्जिद पहुंची कैसे? आइए जानते हैं विस्तार से
130 साल पुरानी है मस्जिद
बता दें कि, पश्चिम बंगाल बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष सामिक भट्टाचार्य ने सोमवार को कोलकाता के नेताजी सुभाष चंद्र बोस अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे के पास स्थित 130 साल से अधिक पुरानी बांकड़ा मस्जिद को दूसरी जगह स्थानांतरित करने के प्रस्ताव का समर्थन किया। उन्होंने कहा कि इस मुद्दे को धर्म से जोड़कर नहीं, बल्कि एयरपोर्ट के विकास और बुनियादी ढांचे की जरूरतों के नजरिए से देखा जाना चाहिए। मीडिया से बातचीत में सामिक भट्टाचार्य ने कहा, “यह मंदिर या मस्जिद का मामला नहीं है। अगर उस जगह पर मस्जिद की बजाय मंदिर भी होता, तब भी उसे जरूरत पड़ने पर दूसरी जगह स्थानांतरित किया जा सकता था।”
बताया जाता है कि यह मस्जिद 130 साल से भी ज्यादा पुरानी है। यह मस्जिद हवाई अड्डे के दूसरे रनवे से करीब 165 मीटर की दूरी पर स्थित है। विमानन अधिकारियों का कहना है कि मस्जिद की मौजूदा जगह की वजह से दूसरे रनवे के विस्तार का काम प्रभावित हो रहा है। इसके साथ ही उड़ानों के संचालन और एडवांस इंस्ट्रूमेंट लैंडिंग सिस्टम (आईएलएस) लगाने में भी देरी हो रही है। यह सिस्टम खास तौर पर सर्दियों में घने कोहरे के दौरान विमानों की सुरक्षित लैंडिंग के लिए जरूरी माना जाता है।
सीएम शुभेंदु ने कही ये बात
समाचार एजेंसी पीटीआई के मुताबिक, पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने भी कहा है कि मस्जिद को दूसरी जगह स्थानांतरित करने का प्रस्ताव सुरक्षा कारणों से जुड़ा हुआ है। वहीं, तृणमूल कांग्रेस के सांसद सौगत रॉय ने इस दावे से असहमति जताई। उन्होंने कहा कि इसका मकसद यात्रियों की सुरक्षा नहीं, बल्कि हवाई अड्डे के रनवे का विस्तार करना है। उन्होंने कहा, “यह फैसला यात्रियों की सुरक्षा के लिए नहीं लिया जा रहा है। असली उद्देश्य रनवे को बड़ा करना है। इसका सुरक्षा से कोई सीधा संबंध नहीं है।”
एयरपोर्ट के अंदर कैसं बनी मस्जिद?
स्थानीय रिकॉर्ड और ऐतिहासिक जानकारी के अनुसार, इस मस्जिद का निर्माण 1890 के दशक में हुआ था। उस समय यहां कोई हवाई अड्डा नहीं था। यह इलाका उत्तर 24 परगना जिले का एक साधारण गांव था और गांव के लोगों के लिए यह मस्जिद इबादत की जगह थी। करीब 30 साल बाद, वर्ष 1924 में ब्रिटिश सरकार ने इस इलाके में एक हवाई पट्टी (एयरोड्रम) बनाने का फैसला किया। शुरुआत में हवाई पट्टी छोटी थी, इसलिए मस्जिद और एयरपोर्ट के बीच किसी तरह की कोई दिक्कत नहीं थी। लेकिन आजादी के बाद जैसे-जैसे हवाई सेवाओं का विस्तार हुआ, वैसे-वैसे एयरपोर्ट का क्षेत्र भी बढ़ता गया।
एयरपोर्ट बढ़ा, लेकिन मस्जिद अपनी जगह बनी रही
इस मामले में बड़ा बदलाव वर्ष 1962 में आया। उस समय पश्चिम बंगाल सरकार ने एयरपोर्ट के विस्तार के लिए आसपास की बड़ी जमीन अधिग्रहित करके एयरपोर्ट प्राधिकरण को सौंप दी। इस दौरान गांव का बड़ा हिस्सा खाली करा लिया गया, लेकिन मस्जिद को नहीं हटाया गया। बताया जाता है कि उस समय प्रशासन और स्थानीय लोगों के बीच सहमति बनी थी कि मस्जिद अपनी मौजूदा जगह पर ही रहेगी। आज का विवाद उसी फैसले से जुड़ा माना जाता है। समय के साथ कोलकाता एयरपोर्ट देश के सबसे व्यस्त हवाई अड्डों में शामिल हो गया। यहां दूसरा रनवे बनाया गया और बाद में टैक्सीवे भी तैयार किए गए। इसके बाद मस्जिद एयरपोर्ट के संचालन क्षेत्र के काफी करीब आ गई। फिलहाल यह मस्जिद दूसरे रनवे से करीब 300 मीटर की दूरी पर स्थित है। विमान संचालन के लिहाज से यह इलाका एयरपोर्ट के सबसे संवेदनशील क्षेत्रों में गिना जाता है।
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