दो दशक में पहली बार DII की हिस्सेदारी FIIs से आगे निकली, Goldman Sachs ने किन सेक्टर पर लगाया दांव
विदेशी निवेशकों (FIIs) की लंबे समय से जारी बिकवाली के बीच भारतीय शेयर बाजार में बड़ा बदलाव देखने को मिला है। Goldman Sachs ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि विदेशी निवेशकों की हिस्सेदारी अब निचले स्तर पर पहुंच गई है और पहली बार दो दशक से ज्यादा समय में घरेलू संस्थागत निवेशकों (DIIs) की हिस्सेदारी FIIs से अधिक हो गई है। कैलेंडर ईयर 2026 की पहली तिमाही के शेयरहोल्डिंग आंकड़ों के मुताबिक भारतीय इक्विटी बाजार में FII हिस्सेदारी घटकर करीब 16 फीसदी रह गई, जबकि DII हिस्सेदारी बढ़कर करीब 17 फीसदी पहुंच गई।
गोल्डमैन सैक्स ने वैश्विक आर्थिक अनिश्चितता और भू-राजनीतिक तनाव के माहौल में भारतीय बाजार के लिए फाइनेंशियल और स्टेपल्स सेक्टर पर दांव लगाया है। ब्रोकरेज का मानना है कि बैंकिंग, फाइनेंशियल सर्विसेज और रोजमर्रा की उपभोक्ता वस्तुओं से जुड़ी कंपनियां मौजूदा माहौल में अपेक्षाकृत बेहतर प्रदर्शन कर सकती हैं। रिपोर्ट के अनुसार फाइनेंशियल सेक्टर मजबूत क्रेडिट ग्रोथ, बेहतर एसेट क्वालिटी और स्थिर कमाई के चलते आकर्षक बना हुआ है। वहीं स्टेपल्स कंपनियों को डिफेंसिव निवेश विकल्प माना जा रहा है।
लार्ज कैप में हिस्सेदारी 10 साल के निचले स्तर पर
रिपोर्ट के अनुसार लार्ज कैप में विदेशी निवेशकों की हिस्सेदारी 10 साल के निचले स्तर पर पहुंच गई है। सेक्टर के लिहाज से बैंकों, रियल एस्टेट और कंज्यूमर रिटेल एंड सर्विसेज में सबसे ज्यादा बिकवाली देखने को मिली, जबकि मेटल्स, यूटिलिटीज और इंडस्ट्रियल्स सेक्टर में विदेशी हिस्सेदारी बढ़ी। घरेलू निवेशकों में म्यूचुअल फंड्स की हिस्सेदारी रिकॉर्ड स्तर पर पहुंची, जबकि सीधे रिटेल निवेशकों की भागीदारी में गिरावट दर्ज की गई।
बिकवाली अंतिम चरण में पहुंच सकती है
एनालिस्ट का मानना है कि विदेशी बिकवाली अब अपने अंतिम चरण में पहुंच सकती है। इस साल अब तक विदेशी निवेशक भारतीय बाजार से करीब 22 अरब डॉलर निकाल चुके हैं, जो पिछले 25 सालों के रिकॉर्ड सालाना आउटफ्लो से भी ज्यादा है। सितंबर 2024 के हाई से अब तक विदेशी निवेशकों ने भारतीय इक्विटी में करीब 53 अरब डॉलर की बिकवाली की है। रिपोर्ट के मुताबिक मौजूदा बिकवाली मार्केट कैप के 0.9 फीसदी तक पहुंच चुकी है, जो 2009 के वैश्विक वित्तीय संकट से भी ज्यादा है, हालांकि 2022 के वैश्विक सख्ती चक्र के 1 फीसदी स्तर से अब भी नीचे है।
एक्सपर्ट का कहना है कि अगर मौजूदा हालात और खराब होते हैं, खासकर ईरान युद्ध लंबा खिंचता है, तो विदेशी निवेशकों की ओर से करीब 4 से 5 अरब डॉलर की अतिरिक्त बिकवाली और हो सकती है। ग्लोबल एक्टिव फंड्स फिलहाल भारत में करीब 220 बेसिस पॉइंट अंडरवेट पोजिशन पर हैं, जबकि चीन में यह अंडरवेट करीब 290 बेसिस पॉइंट है। यदि विदेशी फंड्स भारत में अपनी हिस्सेदारी चीन के स्तर तक घटाते हैं, तो इससे करीब 8 अरब डॉलर की और बिकवाली हो सकती है।
कब होगी विदेशी निवेशकों की वापसी
हालांकि रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि विदेशी बिकवाली का बड़ा हिस्सा अब पीछे छूट चुका है, लेकिन विदेशी निवेशकों की वापसी फिलहाल धीमी रह सकती है। इसका पहला कारण यह है कि तेल कीमतों में गिरावट आने पर भी विदेशी निवेश तुरंत भारतीय बाजार में वापस नहीं आते। अप्रैल की शुरुआत में तेल कीमतों में गिरावट के बावजूद भारतीय बाजार में विदेशी निवेशकों की वापसी नहीं हुई थी।
दूसरा बड़ा कारण कॉर्पोरेट अर्निंग्स को लेकर अनिश्चितता है। रिपोर्ट के मुताबिक विदेशी निवेशक अब कमाई में बदलाव को ज्यादा महत्व दे रहे हैं। बाजार में अनुमान है कि आगे कमाई के अनुमान घट सकते हैं, जिससे निकट अवधि में विदेशी निवेशकों की वापसी सीमित रह सकती है। तीसरा कारण वैल्यूएशन है। रिपोर्ट के अनुसार चीन, ताइवान और अन्य उत्तर एशियाई बाजारों की तुलना में भारत का बाजार ज्यादा महंगा दिखाई देता है। इसके अलावा आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के संभावित असर को लेकर भी निवेशकों के बीच चिंता बनी हुई है।

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