Free Float Market Cap: बिना शेयर की कीमत बढ़े कैसे बदल जाता है कंपनियों का रुतबा? ब्रोकरेज फर्म ने खोला राज
Free Float Market Cap: शेयर बाजार में किसी कंपनी की ताकत का अंदाजा अक्सर उसके शेयर भाव और मार्केट कैप से लगाया जाता है। हालांकि, क्या आप जानते हैं कि किसी कंपनी का शेयर भाव बिल्कुल न बदले, तब भी Nifty 50 और Sensex में उसका दबदबा बढ़ सकता है? ऐसा कंपनी के शेयरों की उपलब्धता में बदलाव के कारण हो सकता है। इस पूरे खेल को समझने के लिए फ्री-फ्लोट मार्केट कैपिटलाइज़ेशन (Free Float Market Capitalisation) को समझना जरूरी है। ब्रोकरेज फर्म Motilal Oswal ने अपने एक लेख में बताया है कि फ्री-फ्लोट मार्केट कैप क्या होता है और यह शेयर बाजार के प्रमुख इंडेक्स में कंपनियों के वेटेज को कैसे प्रभावित करता है। क्या होता है फ्री-फ्लोट मार्केट कैपिटलाइज़ेशन?किसी कंपनी का मार्केट कैप निकालने के लिए उसके कुल शेयरों की संख्या को शेयर के मौजूदा भाव से गुणा किया जाता है। लेकिन फ्री-फ्लोट मार्केट कैप में कंपनी के सभी शेयरों को शामिल नहीं किया जाता। इसमें उन शेयरों की वैल्यू देखी जाती है, जो बाजार में कारोबार के लिए उपलब्ध हैं। कंपनी के प्रमोटरों, सरकार या रणनीतिक निवेशकों के पास मौजूद कुछ शेयर आमतौर पर फ्री-फ्लोट का हिस्सा नहीं माने जाते। इसकी वजह यह है कि ऐसे शेयर सामान्य तौर पर नियमित कारोबार के लिए उपलब्ध नहीं होते। इसी आधार पर Nifty 50 और Sensex जैसे प्रमुख इंडेक्स में कंपनियों का वेटेज तय होता है। यानी किसी कंपनी का कुल मार्केट कैप बड़ा होने भर से यह जरूरी नहीं कि इंडेक्स में भी उसका वेटेज सबसे ज्यादा हो। यह इस बात पर भी निर्भर करता है कि उसके कितने शेयर बाजार में कारोबार के लिए उपलब्ध हैं।शेयर भाव नहीं बढ़ा, फिर भी कैसे बढ़ सकता है वेटेज?इसे एक उदाहरण से समझते हैं। मान लीजिए, किसी कंपनी के कुल 100 करोड़ शेयर हैं और एक शेयर का भाव 100 रुपये है। इस हिसाब से कंपनी का कुल मार्केट कैप 10,000 करोड़ रुपये होगा। अब मान लेते हैं कि कंपनी के कुल शेयरों में से 40 फीसदी शेयर ही बाजार में कारोबार के लिए उपलब्ध हैं। ऐसे में कंपनी का फ्री-फ्लोट मार्केट कैप 4,000 करोड़ रुपये होगा। अब कंपनी के प्रमोटर अपनी हिस्सेदारी का कुछ हिस्सा बेच देते हैं और बाजार में कारोबार के लिए उपलब्ध शेयरों का अनुपात बढ़कर 50 फीसदी हो जाता है। इस दौरान शेयर का भाव 100 रुपये पर ही बना रहता है। ऐसी स्थिति में कंपनी का फ्री-फ्लोट मार्केट कैप बढ़कर 5,000 करोड़ रुपये हो जाएगा। यानी शेयर भाव में कोई बदलाव नहीं होने के बावजूद फ्री-फ्लोट मार्केट कैप में 25 फीसदी की बढ़ोतरी हो गई। इसका असर इंडेक्स में कंपनी के वेटेज पर भी पड़ सकता है। हालांकि, वास्तविक वेटेज इस बात पर निर्भर करेगा कि इंडेक्स में शामिल दूसरी कंपनियों का फ्री-फ्लोट मार्केट कैप कितना है और इंडेक्स की गणना में क्या बदलाव किए जाते हैं।यह भी पढ़ें: NFO: जियो ब्लैकरॉक एएमसी ने गिफ्ट सिटी में लॉन्च किया ग्लोबल इक्विटी फंड, 5,000 डॉलर से शुरू होगा निवेशNifty और Sensex में क्यों मायने रखता है यह बदलाव?Nifty 50 और Sensex बाजार पूंजीकरण के फ्री-फ्लोट तरीके का इस्तेमाल करते हैं। इसका मतलब है कि इंडेक्स में शामिल कंपनियों का वेटेज उनकी फ्री-फ्लोट मार्केट वैल्यू के आधार पर तय होता है। अगर किसी कंपनी के फ्री-फ्लोट मार्केट कैप में बदलाव होता है, तो इंडेक्स में उसका सापेक्ष वेटेज भी बदल सकता है। इसके लिए शेयर का भाव बढ़ना जरूरी नहीं है।इसके उलट, अगर प्रमोटर अपनी हिस्सेदारी बढ़ाते हैं और बाजार में कारोबार के लिए उपलब्ध शेयरों का अनुपात घटता है, तो कंपनी का फ्री-फ्लोट मार्केट कैप कम हो सकता है। इससे इंडेक्स में उसका वेटेज घटने की संभावना रहती है। हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि कंपनी का कारोबार या उसकी वास्तविक कमाई बदल गई है। यह शेयरों की उपलब्धता और इंडेक्स में उनकी गणना से जुड़ा बदलाव भी हो सकता है।यह भी पढ़ें: Nifty Rejig: Nifty 50 से बाहर होगी Wipro, BSE की होगी एंट्री; 30 सितंबर से लागू होगा बदलावनिवेशकों और Index Funds पर क्या पड़ता है असर?फ्री-फ्लोट में बदलाव का असर सिर्फ इंडेक्स के आंकड़ों तक सीमित नहीं रहता। इसका महत्व इंडेक्स को ट्रैक करने वाले म्यूचुअल फंड और एक्सचेंज ट्रेडेड फंड (ETF) के लिए भी है। Nifty 50 या Sensex को ट्रैक करने वाले पैसिव फंड आमतौर पर इंडेक्स में कंपनियों के वेटेज के अनुरूप निवेश करते हैं। अगर किसी कंपनी का इंडेक्स में वेटेज बढ़ता है, तो फंड को अपने पोर्टफोलियो में उस कंपनी का हिस्सा बढ़ाने की जरूरत पड़ सकती है। वेटेज घटने पर इसका उलटा हो सकता है। हालांकि, वास्तविक खरीद-बिक्री इंडेक्स में बदलाव, फंड की रीबैलेंसिंग प्रक्रिया और ट्रैकिंग जरूरतों पर निर्भर करती है। इसका यह मतलब भी नहीं है कि फ्री-फ्लोट बढ़ने से शेयर का भाव अपने आप बढ़ जाएगा। कंपनी के शेयर की कीमत पर मांग और आपूर्ति, कारोबार के नतीजे, भविष्य की संभावनाएं और बाजार की परिस्थितियां जैसे कई कारक असर डालते हैं।यह भी पढ़ें: TCS vs Infosys vs HCL Tech: तिमाही नतीजों के बाद कहां खड़े हैं आईटी स्टॉक्स, किसका बिजनेस और ग्रोथ सबसे मजबूत?शेयर चुनते समय सिर्फ मार्केट कैप देखना काफी नहींनिवेशकों के लिए इस पूरी प्रक्रिया का सबसे अहम सबक यह है कि किसी कंपनी का विश्लेषण करते समय सिर्फ शेयर भाव या कुल मार्केट कैप पर निर्भर नहीं रहना चाहिए। कंपनी की शेयरहोल्डिंग संरचना और बाजार में कारोबार के लिए उपलब्ध शेयरों के अनुपात को समझना भी जरूरी है। फ्री-फ्लोट में बदलाव से इंडेक्स में कंपनी की हिस्सेदारी बदल सकती है, लेकिन इसे अपने आप कंपनी की वित्तीय सेहत में सुधार या शेयर में तेजी का संकेत नहीं माना जाना चाहिए। कुल मिलाकर, Nifty और Sensex में किसी कंपनी का दबदबा सिर्फ उसके शेयर भाव से तय नहीं होता। बाजार में कारोबार के लिए उपलब्ध शेयरों की संख्या भी इसमें अहम भूमिका निभाती है।

Leave a Reply