जब हम रेगिस्तान का नाम लेते हैं, तो दिमाग में सबसे पहले राजस्थान के सुनहरे टीले आते हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि सुदूर दक्षिण में, तमिलनाडु के थूथुकुडी जिले में एक ऐसा रेगिस्तान छिपा है जो सुनहरा नहीं बल्कि सुर्ख लाल है? ‘थेरी काडू’ (Theri Kaadu) के नाम से मशहूर यह इलाका न केवल अपनी खूबसूरती बल्कि अपने 1,00,000 साल पुराने भूगर्भीय इतिहास के लिए भी दुनिया भर के पर्यटकों और वैज्ञानिकों को हैरान कर रहा है।
कुदरत का लाल कैनवास
थूथुकुडी और तिरुनेलवेली जिलों में फैला यह ‘लाल रेगिस्तान’ लगभग 12,000 एकड़ में फैला हुआ है। यहां की रेत का गहरा लाल रंग किसी चित्रकार की कल्पना जैसा लगता है। वैज्ञानिकों के अनुसार, इस रेत में आयरन ऑक्साइड (लौह अयस्क) की मात्रा बहुत अधिक है, जिसके कारण इसे यह अनोखा रंग मिला है। हवाओं के थपेड़ों ने सदियों से यहाँ रेत के ऊंचे-ऊंचे टीले बनाए हैं, जो समय के साथ अपनी जगह बदलते रहते हैं।
रेगिस्तान में जीवन की हरियाली
आमतौर पर रेगिस्तान सूखे और बेजान होते हैं, लेकिन थेरी काडू की कहानी अलग है। यह रेगिस्तान होने के बावजूद यहां मीठे पानी के झरने पाए जाते हैं। यही कारण है कि यहां का पारिस्थितिकी तंत्र (ecosystem) काफी समृद्ध है। यहां ताड़ के पेड़ों की बहुतायत है और कई दुर्लभ वन्यजीव भी देखने को मिलते हैं। हालांकि, यहाँ खेती करना एक बड़ी चुनौती है क्योंकि पानी बहुत जल्दी सोख लिया जाता है। स्थानीय किसान यहाँ धान जैसी फसलें तो नहीं उगा सकते, लेकिन उन्होंने प्रकृति के साथ तालमेल बिठाते हुए यहाँ के स्वदेशी पेड़ों और ताड़ की खेती को अपना लिया है।
इतिहास और भूगोल का संगम
भूवैज्ञानिकों का मानना है कि यह क्षेत्र कभी समुद्र के नीचे हुआ करता था। समय के साथ समुद्र पीछे हट गया और तेज हवाओं ने यहां की मिट्टी को एक नए रूप में ढाल दिया। थेरी काडू की सबसे खास बात यह है कि इसकी रेत आज भी ‘जीवित’ मानी जाती है क्योंकि यह लगातार विस्थापित होती रहती है। यह गुण वैज्ञानिकों को जलवायु परिवर्तन और मरुस्थलीकरण (desertification) के अध्ययन में मदद करता है।
पर्यटन और संरक्षण की ज़रूरत
मंदिरों और समुद्र तटों के लिए मशहूर तमिलनाडु में थेरी काडू एक ‘ऑफबीट’ डेस्टिनेशन के रूप में उभर रहा है। यहाँ की शांति और लाल टीलों के बीच डूबता सूरज एक ऐसा अनुभव देता है जिसे शब्दों में बयां करना मुश्किल है। लेकिन इस प्राकृतिक विरासत को बचाने की भी सख्त जरूरत है। लापरवाही से बढ़ते विकास और कचरे ने इस नाजुक तंत्र को खतरे में डाल दिया है।

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