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फ्लोर टेस्ट या गवर्नर का फैसला? गोवा से कर्नाटक तक… पुराने फॉर्मूले में फंसा तमिलनाडु का सत्ता संकट कैसे सुलझेगा

तमिलनाडु में राज्यपाल आरवी अर्लेकर और विजय की पार्टी तमिलगा वेट्री कझगम (TVK) के बीच सरकार गठन को लेकर बड़ा संवैधानिक विवाद खड़ा हो गया है। TVK चुनाव में 108 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी, लेकिन बहुमत के लिए 118 सीटें चाहिए। कांग्रेस के समर्थन पत्र मिलने के बावजूद राज्यपाल ने अब तक दो बार विजय को सरकार बनाने का न्योता देने से इनकार कर दिया है।

राज्यपाल का कहना है कि TVK के पास अभी “पूर्ण बहुमत” नहीं है। इसी बात को लेकर अब बहस शुरू हो गई है कि ऐसी स्थिति में सबसे पहले मौका किसे मिलना चाहिए- सबसे बड़ी पार्टी को या चुनाव बाद बने गठबंधन को?

संविधान और नियम क्या कहते हैं?

1988 में बनी सरकारिया आयोग ने इस तरह की स्थिति के लिए कुछ दिशानिर्देश दिए थे। उसके मुताबिक:

  • पहले चुनाव से पहले बने गठबंधन को मौका मिलना चाहिए
  • अगर ऐसा गठबंधन नहीं है, तो सबसे बड़ी पार्टी को मौका मिल सकता है, बशर्ते उसे दूसरे दलों का समर्थन हो
  • इसके बाद चुनाव बाद बने गठबंधन पर विचार किया जाता है

सुप्रीम कोर्ट ने भी एस. आर. बोम्मई बनाम भारत संघ मामले में कहा था कि बहुमत का फैसला राजभवन में नहीं बल्कि विधानसभा के फ्लोर टेस्ट में होना चाहिए। यानी असली ताकत सदन में साबित होती है, सिर्फ कागजों पर नहीं।

गोवा और मणिपुर में क्या हुआ था?

2017 में गोवा और मणिपुर में कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी बनी थी। लेकिन भाजपा ने चुनाव बाद दूसरे दलों को साथ लेकर बहुमत जुटा लिया। इसके बाद राज्यपालों ने भाजपा को सरकार बनाने के लिए बुलाया।

कांग्रेस सुप्रीम कोर्ट गई, लेकिन अदालत ने भाजपा सरकार के शपथ ग्रहण पर रोक नहीं लगाई। कोर्ट ने माना कि अगर कोई गठबंधन बहुमत साबित कर सकता है, तो उसका दावा अकेली सबसे बड़ी पार्टी से ज्यादा मजबूत माना जाएगा।

इसी वजह से माना जा रहा है कि तमिलनाडु के राज्यपाल भी यह सुनिश्चित करना चाहते हैं कि TVK और कांग्रेस का समर्थन सच में स्थायी और भरोसेमंद है या नहीं।

कर्नाटक का मामला क्यों अहम है?

2018 में कर्नाटक में बीजेपी 104 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनी थी। लेकिन कांग्रेस और JD(S) ने मिलकर 116 विधायकों का समर्थन दिखा दिया, जो बहुमत से ज्यादा था।

फिर भी राज्यपाल ने पहले भाजपा को सरकार बनाने के लिए बुलाया और 15 दिन का समय दिया। मामला रात में सुप्रीम कोर्ट पहुंचा और अदालत ने समय घटाकर सिर्फ 24 घंटे कर दिया।

कोर्ट ने कहा कि सबसे बड़ी पार्टी को बुलाना गलत नहीं है, लेकिन इसका इस्तेमाल खरीद-फरोख्त के लिए नहीं होना चाहिए।

क्या राज्यपाल बार-बार मना कर सकते हैं?

कानूनी जानकारों के मुताबिक, राज्यपाल यह संतुष्ट होने का अधिकार रखते हैं कि सरकार स्थिर रहेगी या नहीं। लेकिन रामेश्वर प्रसाद बनाम भारत संघ मामले में सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा था कि राज्यपाल सिर्फ अपनी निजी राय के आधार पर किसी दावे को खारिज नहीं कर सकते।

अगर विजय और कांग्रेस ने लिखित समर्थन पत्र दिए हैं और बहुमत का दावा पेश किया है, तो संवैधानिक परंपरा यही कहती है कि उन्हें फ्लोर टेस्ट का मौका दिया जाए।

अगर बिना ठोस कारण के लगातार सरकार बनाने का मौका रोका गया, तो मामला अदालत तक भी पहुंच सकता है।

अब आगे क्या?

तमिलनाडु में अब पूरा मामला इस बात पर टिका है कि राज्यपाल TVK के समर्थन आंकड़ों को मानते हैं या नहीं। अगर विजय को मौका मिलता है, तो उन्हें विधानसभा में बहुमत साबित करना होगा। लेकिन अगर राज्यपाल लगातार इनकार करते रहे, तो यह मामला बड़ा संवैधानिक और कानूनी विवाद बन सकता है।

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