Portfolio Rebalancing: बिना कुछ खरीदे-बेचे भी बढ़ सकता है रिस्क! जानें क्यों जरूरी है रीबैलेंसिंग और कैसे करें
Portfolio Rebalancing : शेयर बाजार में पैसा निवेश करते समय बहुत सोझ समझकर आप अपने पोर्टफोलियो को बैलेंस करते हैं। शुरुआत में सब कुछ आपकी योजना के हिसाब से चलता है। लेकिन कुछ साल बाद जब आप अपने पोर्टफोलियो पर नजर डालते हैं, तो तस्वीर थोड़ी अलग नजर आती है। जिस निवेश को आपने बराबर हिस्से में रखा था, वो अब ऊपर-नीचे हो गया है। यानी एक हिस्सा ज्यादा बढ़ गया है और एक कम हो गया है। आखिर ऐसा क्यों होता है और इसका आपके निवेश पर क्या असर पड़ता है? चलिए आज इसी को विस्तार से समझते हैं।
वैल्यू रिसर्च ने अपने एक्स पर एक वीडियो शेयर कर इस बारे में विस्तार से बताया है। मान लीजिए आपके पास 10 लाख रुपए हैं, जिसे आपने 5 लाख रुपए इक्विटी में और 5 लाख रुपए डेट में लगाए। आपने अपनी तरफ से पूरी तरह बैलेंस्ड पोर्टफोलियो बनाया, यानी 50-50 का स्प्लिट किया। लेकिन कुछ साल बाद बाद जब आपने अपना पोर्टफोलियो चेक किया तो बैलेंस अब बैलेंस रहा ही नहीं।
कैसे बदल जाता है बैलेंस?
अब सोचिए इक्विटी मार्केट में अच्छी तेजी आई और आपका 5 लाख का इक्विटी निवेश बढ़कर 10 लाख रुपए हो गया। वहीं डेट वाला हिस्सा धीरे-धीरे बढ़कर 5 लाख से 6 लाख हुआ। आपने न कुछ नया खरीदा, न कुछ बेचा, फिर भी अब आपका पोर्टफोलियो 50-50 नहीं रहा। अब इक्विटी का हिस्सा करीब 63% हो चुका है, और डेट सिर्फ 37% रह गया है। जबकि आपने इसे 50-50% के लिए प्लान किया था।
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रिस्क बढ़ने का मतलब क्या है?
यहीं असली दिक्कत शुरू होती है। जब इक्विटी का हिस्सा बढ़ जाता है, तो पोर्टफोलियो में रिस्क भी अपने-आप बढ़ जाता है। अगर मार्केट में अगली गिरावट आती है, तो यह गिरावट आपको उतना नुकसान नहीं पहुंचाएगी जितना आपने प्लान किया था, बल्कि उससे कहीं ज्यादा असर डालेगी। खास बात यह है कि इसके लिए किसी ने जानबूझकर कोई गलती नहीं की, यह रिस्क अपने-आप, सिर्फ मार्केट की तेजी की वजह से बढ़ गया। जिस हिस्से ने अच्छा परफॉर्म किया, उसी ने चुपचाप आपका रिस्क प्रोफाइल बदल दिया।
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रीबैलेंसिंग की जरूरत यहीं से आती है
पोर्टफोलियो रीबैलेंसिंग का मतलब है, जो हिस्सा ज्यादा बढ़ गया है, उसमें से कुछ पैसा निकालकर उस हिस्से में डालना जो पीछे रह गया है। यानी हमारे उदाहरण में, इक्विटी से कुछ पैसा निकालकर डेट में डालना, ताकि आप फिर से अपने 50-50 स्प्लिट पर वापस आ जाएं। ऐसे में अगर मार्केट गिरता भी है तो आपको उतना नुसकान नहीं होगा। आपका पोर्टफोलियो बैलन्स रहेगा।
रीबैलेंसिंग से आपके पोर्टफोलियो का जोखिम तय सीमा में बना रहता है। इसमें एक और फायदा है, जो एसेट ज्यादा बढ़ गया है, उसमें से कुछ पैसा निकालकर आप उस एसेट में लगा सकते हैं, जो पीछे रह गया है। यानी बिना बाजार का सही समय पता लगाए, आप बढ़ी हुई कीमत पर कुछ मुनाफा निकालते हैं और कम बढ़े हुए एसेट में पैसा लगाते हैं।
इसलिए, भले ही आपने कुछ नया खरीदा हो या ना खरीदा हो पोर्टफोलियो को चेक करना जरूरी है, उसे बैलन्स करना जरूरी है।

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