Tata Sons की लिस्टिंग का रास्ता साफ, RBI ने CIC से बाहर निकलने की अर्जी की खारिज
भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने Tata Sons की कोर इन्वेस्टमेंट कंपनी (CIC) के तौर पर रजिस्ट्रेशन रद्द करने की अर्जी खारिज कर दी है। सूत्रों के मुताबिक टाटा संस ने 2024 में RBI के पास अपना सर्टिफिकेट ऑफ रजिस्ट्रेशन (CoR) सरेंडर करने के लिए आवेदन किया था, ताकि उसे CIC के तौर पर डीरजिस्टर किया जा सके। सूत्रों के अनुसार RBI के नियमों के तहत टाटा संस को अपने शेयरों को शेयर बाजार में लिस्ट करना जरूरी होगा। CIC के तौर पर डीरजिस्ट्रेशन की अर्जी खारिज होने के बाद अब टाटा संस के लिए लिस्टिंग की प्रक्रिया आगे बढ़ाने का रास्ता साफ हो गया है।
सूत्रों के मुताबिक RBI ने 11 सितंबर 2026 को भेजे पत्र में Tata Sons की CIC कैटेगरी से स्वैच्छिक रूप से बाहर निकलने की अर्जी को मंजूर करने से इनकार कर दिया। RBI ने आवेदन के सभी पहलुओं की समीक्षा के बाद पाया कि कंपनी की इस मांग को स्वीकार नहीं किया जा सकता। इसका सीधा असर Tata Sons की लिस्टिंग पर पड़ेगा और अब कंपनी को रेगुलेटरी नियमों के तहत शेयर बाजार में लिस्ट होना पड़ सकता है।
RBI ने 2022 में टाटा संस को अपर लेटर NBFC माना था। दरअसल RBI ने सितंबर 2022 में टाटा संस को अपर लेटर नॉन-बैंकिंग फाइनेंशियस कंपनी (NBFC) के तौर पर क्लासिफाई किया था। इसके साथ ही कंपनी को तीन साल के भीतर शेयर बाजार में लिस्ट होने के लिए कहा गया था। इस समयसीमा के मुताबिक टाटा संस को सितंबर 2025 तक लिस्टिंग पूरी करनी थी। हालांकि कंपनी तय समयसीमा के बाद भी शेयर बाजार में लिस्ट नहीं हुई।
इसके बाद टाटा संस ने 2024 में RBI के पास अपना कोर इन्वेस्टमेंट कंपनी (CIC) रजिस्ट्रेशन सरेंडर करने के लिए आवेदन किया। कंपनी का तर्क था कि वह कर्ज-मुक्त हो चुकी है और इसलिए CIC के तौर पर रजिस्ट्रेशन बनाए रखने की जरूरत नहीं है। इस आवेदन पर लंबे समय तक RBI की ओर से अंतिम फैसला नहीं आया।
अगस्त 2026 में RBI ने एक बार फिर टाटा संस को अपर लेटर NBFCs की सूची में शामिल किया था। हालांकि उस समय केंद्रीय बैंक ने यह भी स्पष्ट किया था कि कंपनी के CIC से डीरजिस्ट्रेशन के आवेदन पर अंतिम फैसला अभी बाकी है। RBI ने टाटा संस की लिस्ट में मौजूदगी को उसके लंबित आवेदन के अंतिम नतीजे के अधीन बताया था।
अब RBI की ओर से आवेदन खारिज किए जाने के बाद टाटा संस के लिए लिस्टिंग से बचने का रास्ता काफी मुश्किल हो गया है। इसका मतलब यह है कि कंपनी को अब रेगुलेटरी जरूरतों को पूरा करने के लिए मार्केट में आने की दिशा में आगे बढ़ना पड़ सकता है।

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