Hormuz Blockade: सिर्फ तेल ही नहीं बल्कि महंगाई से लेकर कमाई तक, होर्मुज की नाकेबंदी से भारत को है सबसे ज्यादा खतरा
Last Updated on April 13, 2026 12:30, PM by Pawan
US Hormuz Blockade: इस्लामाबाद में अमेरिका और ईरान के बीच शांति को लेकर हुई वार्ता विफल रही। इसके बाद ट्रंप ने ईरान की नाकेबंदी का ऐलान किया। आज से ईरान के खिलाफ अमेरिका की नौसैनिक नाकेबंदी शुरू होने वाली है और भारत के लिए यह खबर किसी बड़े झटके से कम नहीं है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह होर्मुज से आने वाले तेल की कीमतों में भारी उछाल का मामला नहीं है, बल्कि भारत की पूरी अर्थव्यवस्था पर पड़ने वाली एक ‘चौतरफा मार’ है। कच्चे तेल के $100 के पार पहुंचने के साथ ही भारत के लिए कई स्तर पर जोखिम की संभावनाएं दिखने लगी है।
LPG की कमी से सीधे भारतीय रसोई पर असर
भारत के लिए सबसे बड़ी चिंता रसोई गैस यानी LPG को लेकर है। भारत अपनी LPG जरूरत का लगभग 60% आयात करता है। इस आयात का 90% हिस्सा होर्मुज जलसंधि से होकर आता है। नाकेबंदी के कारण अगर सप्लाई में देरी होती है, तो रसोई गैस की कीमतें बढ़ सकती हैं या सरकार पर सब्सिडी का बोझ और भारी हो सकता है।
LNG की कमी से खाद और बिजली उत्पादन पर संकट
प्राकृतिक गैस (LNG) के मामले में भी स्थिति गंभीर है। भारत के कुल LNG आयात का करीब आधा हिस्सा इसी रास्ते से आता है। गैस की कमी या बढ़ती कीमतों का सीधा असर बिजली उत्पादन, खाद बनाने वाली कंपनियों और शहरों में CNG की सप्लाई पर पड़ेगा। इससे खेती की लागत भी बढ़ सकती है, जिससे गेहूं, चावल जैसे अनाज के दाम बढ़ेंगे। लंबे समय में इसका असर खाने की चीजों पर देखने को मिलेगा।
कच्चा तेल की कीमतों में उछाल से महंगाई और रुपये पर दबाव
भारत अपनी जरूरत का करीब आधा कच्चा तेल इसी रास्ते से मंगाता है। भले ही रास्ता पूरी तरह बंद न हो, लेकिन बीमा प्रीमियम और मालभाड़ा बढ़ने से तेल की ‘लैंडेड कॉस्ट’ बढ़ जाएगी। तेल महंगा होने से भारत का आयात बिल बढ़ेगा, जिससे व्यापार घाटा बढ़ेगा और डॉलर के मुकाबले रुपया और कमजोर हो सकता है।
मिडिल ईस्ट में 90 लाख भारतीयों की कमाई पर आंच
एक ऐसा खतरा जिसे अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है, वह है खाड़ी देशों में रहने वाले भारतीय। खाड़ी देशों में करीब 80-90 लाख भारतीय रहते हैं, जो हर साल लगभग $100 बिलियन रेमिटेंस भारत भेजते हैं। अगर नाकेबंदी के कारण खाड़ी देशों की अर्थव्यवस्था सुस्त पड़ती है, तो वहां भारतीयों की नौकरियों और उनकी कमाई पर असर पड़ेगा, जिसका सीधा असर भारत के विदेशी मुद्रा भंडार पर होगा।
मैन्युफैक्चरिंग और FMCG सेक्टर पर असर
कच्चा तेल और गैस केवल ईंधन नहीं हैं, ये उद्योगों के लिए कच्चे माल का काम भी करते हैं। इसकी किल्लत से प्लास्टिक, पेंट, केमिकल और पैकेजिंग इंडस्ट्री की लागत बढ़ेगी। कंपनियां बढ़ी हुई लागत का बोझ ग्राहकों पर डालेंगी, जिससे साबुन, तेल से लेकर पेंट और प्लास्टिक के सामान तक सब महंगे हो सकते हैं जिससे आम आदमी की जेब पर सीधी मार पड़ेगी।
क्यों पैदा हुए ये हालात?
अमेरिका और ईरान के बीच इस्लामाबाद में हुई 21 घंटे की बातचीत विफल होने के बाद यह संकट खड़ा हुआ है। अमेरिका का लक्ष्य ईरान के तेल एक्सपोर्ट को रोकना है। हालांकि, दुनिया के इस सबसे महत्वपूर्ण समुद्री रास्ते पर सैन्य तनाव बढ़ने से भारत जैसे देशों के लिए आर्थिक जोखिम कई गुना बढ़ गया है। अगर ये तनाव जारी रहता है तो होर्मुज पर निर्भर देशों को आने वाले दिनों में गंभीर समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है।
