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Sonia Gandhi: ‘महिला आरक्षण नहीं, परिसीमन है असली मुद्दा’: केंद्र सरकार पर सोनिया गांधी का हमला

Sonia Gandhi: ‘महिला आरक्षण नहीं, परिसीमन है असली मुद्दा’: केंद्र सरकार पर सोनिया गांधी का हमला

Last Updated on April 13, 2026 13:14, PM by Pawan

Sonia Gandhi: कांग्रेस संसदीय दल की अध्यक्ष सोनिया गांधी ने महिला आरक्षण, ‘परिसीमन’ और ‘जाति जनगणना’ को लेकर केंद्र सरकार पर निशाना साधा है। उन्होंने कहा कि इस हफ्ते संसद के विशेष सत्र में बिल लाने के सरकार के कदम के पीछे असली मुद्दा परिसीमन है, न कि महिला आरक्षण। उन्होंने सवाल उठाया कि ये सत्र ऐसे समय में क्यों बुलाया जा रहा है जब तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल में चुनाव अभियान अपने चरम पर है।

‘द हिंदू’ में लिखे अपने एक आर्टिकल में सोनिया गांधी ने लिखा सरकार की सीमांकन योजना, जो अभी अनौपचारिक जानकारी के आधार पर सामने आई है, “बहुत खतरनाक है और यह संविधान पर सीधा हमला है।”

यह तब हुआ जब प्रधानमंत्री मोदी ने सभी राजनीतिक दलों को पत्र लिखकर महिला आरक्षण बिल में बदलाव के लिए समर्थन मांगा। महिला आरक्षण बिल, जिसे नारी शक्ति वंदन अधिनियम भी कहा जाता है, संसद और विधानसभाओं में महिलाओं के लिए एक तिहाई आरक्षण का प्रावधान करता है। इसे 2023 में संसद में पारित किया गया था। एक प्रस्तावित विधेयक में इसके कार्यान्वयन को 2027 की जनगणना से अलग करने और इसे 2011 की जनगणना पर आधारित करने का प्रस्ताव है, ताकि यह 2029 के आम चुनाव से पहले लागू हो सके।

गांधी ने कहा है कि प्रधानमंत्री विपक्ष से उन बिलों के समर्थन की मांग कर रहे हैं, जिन्हें वे संसद के विशेष सत्र में जबरदस्ती पारित कराना चाहते हैं, जबकि तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल में चुनाव प्रचार अपने चरम पर होगा। उन्होंने लिखा, “इस असाधारण जल्दबाजी का केवल एक ही कारण हो सकता है, और वह है राजनीतिक लाभ उठाना और विपक्ष को कमजोर स्थिति में लाना। प्रधानमंत्री हमेशा की तरह सच को तोड़-मरोड़ कर पेश कर रहे हैं।”

कांग्रेस की वरिष्ठ नेता ने कहा कि केंद्र सरकार ने ही महिला आरक्षण विधेयक को अगली जनगणना से जोड़ा है। उन्होंने लिखा, “विपक्ष ने यह शर्त नहीं रखी थी। दरअसल, राज्यसभा में विपक्ष के नेता मल्लिकार्जुन खड़गे ने मांग की थी कि आरक्षण का प्रावधान 2024 के लोकसभा चुनावों से ही लागू किया जाए। सरकार ने अपने कारणों से इस पर सहमति नहीं जताई।”

सोनिया गांधी ने आगे कहा, “अब हमें बताया जा रहा है कि अनुच्छेद 334-ए में संशोधन करके महिलाओं के लिए आरक्षण 2029 से ही लागू किया जाएगा। प्रधानमंत्री को अपना यह फैसला बदलने में 30 महीने क्यों लग गए? और वे विशेष सत्र बुलाने के लिए कुछ हफ्तों का इंतजार क्यों नहीं कर सकते? विपक्षी नेताओं ने सरकार को एक बार नहीं बल्कि तीन बार पत्र लिखकर अनुरोध किया है कि पश्चिम बंगाल में 29 अप्रैल को अंतिम चरण के चुनाव समाप्त होने के बाद सर्वदलीय बैठक बुलाई जाए, ताकि सरकार के नए प्रस्तावों पर चर्चा की जा सके। लेकिन इस बिल्कुल वाजिब अनुरोध को ठुकरा दिया गया है। इसके बजाय, प्रधानमंत्री ने संपादकीय लेख लिखने, राजनीतिक दलों से अपील करने और सम्मेलन आयोजित करने का सहारा लिया है। उन्होंने इसे गलत तरीका बताते हुए कहा कि यह प्रधानमंत्री की श्रेष्ठता की भावना और उनके ‘या तो मेरी बात मानो या फिर रास्ता छोड़ दो’ वाले रवैये को दर्शाती है।”

कांग्रेस नेता ने केंद्र सरकार के महिला आरक्षण बिले के संभालने के तरीके और पूर्व प्रधानमंत्री और उनके पति राजीव गांधी की सरकार द्वारा पंचायतों और नगर पालिकाओं के चुनावों में महिलाओं के लिए आरक्षण संबंधी कानून लाने के तरीके की तुलना की। उन्होंने कहा, “नारी शक्ति वंदन अधिनियम, 2023 इसी उपलब्धि की नींव पर खड़ा है।”

गांधी ने कहा कि नरेंद्र मोदी सरकार ने 2021 में होने वाली जनगणना को लगातार टाला। उन्होंने लिखा, “इसका एक परिणाम यह हुआ है कि 10 करोड़ से अधिक लोग राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम, 2013 के तहत अपने कानूनी अधिकारों से वंचित रह गए हैं, जो प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना का आधार है। जनगणना का काम पांच साल की बिना वजह देरी के बाद ही शुरू हुआ है।”

उन्होंने आगे लिखा, “इसे डिजिटल जनगणना बताकर गर्व जताया जा रहा है। वरिष्ठ अधिकारियों ने स्वयं सार्वजनिक रूप से घोषणा की है कि इसके डिजिटल स्वरूप के कारण, अधिकांश जनसंख्या गणना के आंकड़े 2027 तक ही उपलब्ध हो जाएंगे। इस सत्र को बुलाने और परिसीमन करने की सरकार की जल्दबाजी के बहाने साफ तौर पर खोखले हैं।”

गांधी ने यह भी कहा कि जाति जनगणना से 2027 की जनगणना के रिपोर्ट में देरी होने का “प्रचार” “बिल्कुल झूठ” है। उन्होंने कहा, “दरअसल, प्रधानमंत्री का असली इरादा अब जाति जनगणना में और देरी करना और उसे पटरी से उतारना है।”

गांधी ने लिखा, 16 अप्रैल से संसद का विशेष सत्र शुरू होने वाला है, लेकिन अभी तक सांसदों के साथ यह साफ तौर पर साझा नहीं किया गया है कि सरकार इस सत्र में क्या चर्चा करना चाहती है। ऐसा लगता है कि परिसीमन के लिए कोई फार्मूला सुझाया जा रहा है। किसी भी परिसीमन से पहले, पहले की तरह, जनगणना होनी चाहिए। और यह तो स्पष्ट है कि लोकसभा की संख्या में बढ़ोतरी करने वाला कोई भी परिसीमन राजनीतिक रूप से न्यायसंगत होना चाहिए, न कि केवल गणितीय रूप से। परिवार नियोजन में अग्रणी रहे राज्यों और छोटे राज्यों को किसी भी तरह से नुकसान नहीं होना चाहिए। सीटों में समान अनुपात बढ़ाने से भी कई राज्यों का प्रभाव कम हो सकता है, क्योंकि बड़े राज्यों की संख्या का फर्क और ज्यादा बढ़ जाएगा।”

कांग्रेस नेता ने कहा कि संसद का मानसून सत्र जुलाई के मध्य में शुरू होगा। उन्होंने लिखा, “अगर सरकार 29 अप्रैल के बाद सर्वदलीय बैठक बुलाकर विपक्ष के साथ अपने प्रस्तावों पर चर्चा करे, सार्वजनिक बहस के लिए समय दे, और फिर मानसून सत्र में संविधान संशोधन विधेयकों पर विचार करे, तो आसमान नहीं गिर जाएगा। उन्होंने कहा, इतनी जल्दबाजी में बहुत बड़े और महत्वपूर्ण बदलावों को बिना सही प्रक्रिया के लागू करने की कोई जरूरत नहीं है, सिवाय इसके कि सरकार अपनी राजनीतिक कहानी को मजबूत करना चाहती है। यह तरीका गलत और लोकतंत्र के खिलाफ है। महिलाओं के लिए आरक्षण यहां मुद्दा नहीं है। वह पहले ही तय हो चुका है। असली मुद्दा परिसीमन है, जो अनौपचारिक रूप से उपलब्ध जानकारी के आधार पर, बेहद खतरनाक है और संविधान पर सीधा हमला है।”

इससे पहले, प्रधानमंत्री ने लिखा कि 2023 में महिला आरक्षण विधेयक का पारित होना एक यादगार समय था जो संसद में एकता को दर्शाता है। उन्होंने कहा, “मैं उस दिन को भारत की संसदीय यात्रा में एक महत्वपूर्ण और प्रेरणादायक मील का पत्थर मानता हूं।” उन्होंने आगे कहा कि “लंबे विचार-विमर्श के बाद हम इस निष्कर्ष पर पहुंचे हैं कि नारी शक्ति वंदन अधिनियम को देश भर में उसके सही अर्थों में लागू करने का समय आ गया है। यह अनिवार्य है कि 2029 के लोकसभा और विधानसभा चुनाव महिलाओं के लिए आरक्षण के साथ कराए जाएं। इससे भारत की लोकतांत्रिक संस्थाओं में नई ऊर्जा का संचार होगा और जनता का विश्वास मजबूत होगा। साथ ही, इससे शासन में अधिक भागीदारी और प्रतिनिधित्व सुनिश्चित होगा।”

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