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स्टॉक मार्केट ने ईरान युद्ध का झटका झेल लिया, या अभी आएगी और गिरावट? जानिए एक्सपर्ट्स से

स्टॉक मार्केट ने ईरान युद्ध का झटका झेल लिया, या अभी आएगी और गिरावट? जानिए एक्सपर्ट्स से

Last Updated on April 13, 2026 21:02, PM by Pawan

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपनी नौसेना को स्ट्रेट ऑफ होर्मुज की नाकेबंदी का आदेश दिया है। ट्रंप ने यह फैसला अमेरिका और ईरान के बीच हालिया बातचीत बेनतीजा रहने की वजह से लिया। इसके चलते शेयर बाजार में गिरावट और कच्चे तेल में तेजी का ट्रेंड दिखा। सोमवार को निफ्टी 0.86% की गिरावट के साथ 23,843 पर बंद हुआ। अमेरिकी शेयर बाजार भी लाल निशान में खुले। वहीं, तेल का दाम 9% तक चढ़ गया।

ब्रेंट क्रूड की कीमत बढ़कर $102-103 प्रति बैरल पहुंच गई है। यह 2025 के औसत $70 के मुकाबले करीब 45% ज्यादा है। इससे दुनियाभर में महंगाई की चिंता भी बढ़ गई है। आइए जानते हैं कि इसका भारत पर क्या असर पड़ सकता है।

तेल की कीमतों में उछाल का असर

The Wealth Company के अक्षय चिंचलकर के मुताबिक, ट्रंप के नाकाबंदी वाले फैसले से तेल की सप्लाई पर दबाव बढ़ेगा। इसका असर पहले ही दिखने लगा है और ब्रेंट $100 के ऊपर पहुंच गया है। हालांकि उनका कहना है कि अभी तक बाजार पर इसका असर उतना गंभीर नहीं है, जितना पहले अंदाजा लगाया जा रहा था। भारत में रुपये पर दबाव दिखा है और यह 93 के नीचे ट्रेड कर रहा है। 10 साल की बॉन्ड यील्ड बढ़ी जरूर है, लेकिन अभी 7% के अहम स्तर को पार नहीं कर पाई है।

उन्होंने यह भी कहा कि इस समय सीजनल फैक्टर बाजार को सपोर्ट दे रहे हैं और डॉलर इंडेक्स भी ज्यादा मजबूत नहीं हो पा रहा है। इससे बाजार को कुछ राहत मिल रही है।

क्या गिरावट खत्म हो गई है?

पिछले हफ्ते सीजफायर की खबरों से बाजार में कुछ स्थिरता आई थी और निफ्टी मार्च के 22,180 के निचले स्तर से ऊपर आया था। कई ब्रोकरेज का मानना है कि गिरावट अब थम रही है, लेकिन V-शेप यानी गिरावट की तरह रिकवरी की संभावना कम है।

अब निवेशकों के सामने सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या इस पूरे तनाव का असर बाजार में पहले ही शामिल हो चुका है या आगे और दबाव आ सकता है। क्योंकि अगले 4-8 हफ्तों में इसका असर महंगाई, सरकारी खर्च और कंपनियों की कमाई पर पड़ सकता है।

एक्सपर्ट्स की अलग-अलग राय

Kotak Securities के श्रीकांत चौहान का मानना है कि अभी यह कहना जल्दबाजी होगी कि बाजार पूरी तरह सुरक्षित है। उनके मुताबिक तेल की कीमतें अभी भी पिछले साल के मुकाबले काफी ज्यादा हैं, जो भारत जैसे आयात-निर्भर देश के लिए चिंता की बात है।

वहीं Motilal Oswal के नंदीश शाह का नजरिया थोड़ा पॉजिटिव है। उनका कहना है कि अगर यह तनाव लंबा नहीं चलता, तो बाजार ने इसका असर काफी हद तक पहले ही झेल लिया है।

Waterfield Advisors के विपुल भावर के मुताबिक, जैसे ही युद्ध की अवधि स्पष्ट होगी, बाजार फिर से इकोनॉमिक ग्रोथ और कंपनियों के नतीजों पर ध्यान देना शुरू कर देगा।

भारत के लिए बढ़ती चिंता

अगर कच्चे तेल की कीमतें लंबे समय तक ऊंची रहती हैं, तो इससे महंगाई, फिस्कल डेफिसिट और कंपनियों की कमाई पर दबाव पड़ेगा। फिलहाल बाजार पर ज्यादा असर ग्लोबल संकेत, लिक्विडिटी और निवेशकों के मूवमेंट का रहेगा।

भारत के स्ट्रैटेजिक पेट्रोलियम रिजर्व अभी सिर्फ 64% भरे हैं। यह मौजूदा खपत के हिसाब से 9-10 दिन का स्टॉक देते हैं। Reliance Industries को हाल ही में ईरानी तेल टैंकर उतारने की अनुमति मिली थी, लेकिन खबर है कि कुछ जहाज रास्ता बदल रहे हैं ताकि नाकेबंदी से बच सकें। साथ ही चाबहार पोर्ट पर अमेरिकी छूट 26 अप्रैल को खत्म होने वाली है, जो भारत के लिए एक अहम ऊर्जा रास्ता है।

तेल कंपनियों पर बढ़ता दबाव

फिलहाल ऑयल मार्केटिंग कंपनियां पेट्रोल पर ₹21 प्रति लीटर और डीजल पर ₹28 प्रति लीटर का नुकसान उठा रही हैं। अगर कीमतें नहीं बढ़ाई गईं और यह स्थिति 30–45 दिन तक जारी रही, तो सरकार पर सब्सिडी का बोझ बढ़ सकता है और फिस्कल डेफिसिट पर असर पड़ सकता है।

निवेशकों के लिए क्या रणनीति

एनालिस्ट्स का मानना है कि ऐसे समय में घरेलू सेक्टर जैसे ऑयल अपस्ट्रीम, फर्टिलाइजर, डिफेंस और कुछ PSU स्टॉक्स में गिरावट पर खरीदारी की जा सकती है। साथ ही थोड़ी कैश पोजिशन बनाए रखना भी जरूरी है, क्योंकि आगे वोलैटिलिटी बढ़ सकती है।

इंडिया VIX मार्च के 28 के स्तर से घटकर लगभग 20.6 पर आ गया है। वहीं निफ्टी का 12 महीने का फॉरवर्ड वैल्यूएशन 18x पर है, जो लॉन्ग टर्म औसत से 15% कम है। एक्सपर्ट के मुताबिक, फिलहाल 18x वैल्यूएशन लॉन्ग टर्म निवेशकों के लिए ठीक माना जा रहा है, लेकिन यह तभी टिकेगा जब यह तनाव ज्यादा लंबा नहीं खिंचेगा।

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