59 यात्रियों को बिना टिकट बस में बैठाना एक कंडक्टर को इतना भारी पड़ गया कि उसकी पूरी जिंदगी बदल गई। पहले यूपी के बस कंडक्टर की सरकारी नौकरी चली गई। फिर 22 साल तक कोर्ट के चक्कर लगते रहे, लेकिन आखिर में राहत नहीं मिली। हाईकोर्ट ने कहा कि इससे सरकार को पैसे का बड़ा नुकसान हुआ है। ये मामला सरकारी कर्मचारियों के लिए दंग करने वाला रहा क्योंकि नौकरी में लापरवाही करना भारी पड़ा। हालांकि, कंडक्टर ने सफाई दी कि तबीयत खराब थी जिसके कारण टिकट बांट नहीं पाया। लेकिन Allahabad High Court ने साफ कह दिया कि बिना टिकट यात्रियों को सफर कराना सिर्फ गलती नहीं, बल्कि सरकार को नुकसान पहुंचाने जैसा है।
Allahabad High Court ने उत्तर प्रदेश राज्य सड़क परिवहन निगम (UPSRTC) के एक बस कंडक्टर को बड़ी राहत देने से इनकार कर दिया। कोर्ट ने साफ कहा कि बिना टिकट यात्रियों को सफर कराना गंभीर लापरवाही और बेईमानी है, जिससे सरकार को आर्थिक नुकसान हो सकता है। इसी आधार पर कंडक्टर की नौकरी से बर्खास्तगी को सही माना गया।
यह मामला 23 जून 2004 का है। उस समय कंडक्टर फैजाबाद से अकबरपुर जा रही UPSRTC बस में ड्यूटी कर रहा था। यात्रा शुरू होने के करीब 12 किलोमीटर बाद बस की अचानक चेकिंग की गई। चेकिंग में पाया गया कि बस में 59 यात्री बिना टिकट सफर कर रहे थे। हालांकि कंडक्टर ने पे-बिल भर दिए थे, लेकिन यात्रियों को टिकट जारी नहीं किए गए थे।
इसके बाद कंडक्टर को चार्जशीट दी गई और जांच शुरू हुई। 19 सितंबर 2004 को जांच रिपोर्ट पेश की गई। फिर सहायक क्षेत्रीय प्रबंधक अकबरपुर ने कारण बताओ नोटिस जारी किया और बाद में कंडक्टर की सर्विस खत्म कर दी गई। कंडक्टर ने इस फैसले के खिलाफ इलाहाबाद हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की।
कोर्ट में कंडक्टर की ओर से दलील दी गई कि जांच वाले दिन उसकी तबीयत खराब थी और उसे पेट दर्द हो रहा था। वकील ने यह भी कहा कि बस की जांच सिर्फ 2 किलोमीटर बाद की गई थी, इसलिए वह टिकट बांट नहीं पाया। साथ ही यह भी कहा गया कि उसने यात्रियों से पैसे ले लिए थे और पे-बिल भर दिए थे, इसलिए निगम को कोई आर्थिक नुकसान नहीं हुआ।
कंडक्टर के वकील ने यह भी बताया कि जांच रिपोर्ट तैयार करने वाले अधिकारी की केस के दौरान मौत हो चुकी है, इसलिए रिपोर्ट को सही तरीके से साबित नहीं किया जा सका। किसी यात्री का बयान भी दर्ज नहीं हुआ था।
वहीं UPSRTC की ओर से कोर्ट को बताया गया कि बस की जांच 12 किलोमीटर बाद हुई थी, न कि 2 किलोमीटर बाद। इतने लंबे सफर के बाद भी टिकट न देना गंभीर गड़बड़ी है। निगम ने कहा कि कंडक्टर को जवाब देने का मौका दिया गया था, लेकिन वह संतोषजनक जवाब नहीं दे पाया।
हाईकोर्ट ने पुराने एक फैसले का हवाला देते हुए कहा कि बिना टिकट यात्रियों को ले जाना या कम टिकट देना बेईमानी और गंभीर लापरवाही माना जाएगा। कोर्ट ने माना कि कंडक्टर के पास टिकट बांटने के लिए काफी समय था, लेकिन उसने ऐसा नहीं किया। 16 अप्रैल 2026 को दिए गए फैसले में हाईकोर्ट ने याचिका खारिज कर दी और कंडक्टर की नौकरी खत्म करने के आदेश को बरकरार रखा।
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