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NPS Withdrawal: रिटायरमेंट के बाद हर महीने चाहिए तय रकम या बाजार के हिसाब से बदलता पैसा? समझें SLW और SUR का फर्क
NPS Withdrawal: रिटायरमेंट के बाद हर महीने चाहिए तय रकम या बाजार के हिसाब से बदलता पैसा? समझें SLW और SUR का फर्क

NPS Withdrawal: रिटायरमेंट के बाद हर महीने चाहिए तय रकम या बाजार के हिसाब से बदलता पैसा? समझें SLW और SUR का फर्क

रिटायरमेंट के लिए करोड़ों रुपये का कॉर्पस तैयार कर लेना ही पूरी प्लानिंग नहीं है। असली चुनौती तब शुरू होती है, जब नौकरी की नियमित सैलरी बंद हो जाती है और उसी जमा रकम से अगले 20-30 साल या उससे भी ज्यादा समय तक खर्च चलाना होता है। ऐसे में सवाल सिर्फ यह नहीं है कि आपके पास कितना पैसा है, बल्कि यह भी है कि हर महीने कितना पैसा निकालें और किस तरीके से निकालें, ताकि कॉर्पस बहुत जल्दी खत्म न हो।

NPS यानी नेशनल पेमेंट सिस्टम में रिटायरमेंट के बाद पैसा निकालने के लिए (nps retirement planning) निवेशकों को कुछ विकल्प मिलते हैं। लागू निकासी नियमों और कॉर्पस के आकार के आधार पर पात्र राशि को एकमुश्त लिया जा सकता है या नियमित अंतराल पर निकासी की जा सकती है। इनमें सिस्टमैटिक लमसम विड्रॉल (Systematic Lump Sum Withdrawal – SLW) और सिस्टमैटिक यूनिट रिडेम्पशन (Systematic Unit Redemption – SUR) जैसे विकल्प शामिल हैं। दोनों के नाम मिलते-जुलते हैं, लेकिन दोनों में एक बड़ा अंतर है कि SLW में रकम तय होती है, जबकि SUR में यूनिट्स की संख्या।

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SLW में हर महीने कितने रुपये चाहिए, आप तय करते हैं

SLW में आप यह तय करते हैं कि नियमित अंतराल पर कितनी रकम निकालनी है। मान लीजिए आपने तय किया कि आपको NPS से हर महीने 50,000 रुपये चाहिए। अब NPS यूनिट की कीमत यानी NAV यानी नेट एसेट वैल्यू बाजार के साथ बदलती रहेगी। अगर NAV बढ़ जाती है, तो 50,000 रुपये निकालने के लिए कम यूनिट बेचनी पड़ेंगी। वहीं, अगर बाजार गिरता है और NAV कम हो जाती है, तो उतनी ही 50,000 रुपये की रकम निकालने के लिए ज्यादा यूनिट बेचनी पड़ेंगी। यानी आसान भाषा में समझें तो

SLW = हर बार मिलने वाली रकम तय, लेकिन बेची जाने वाली यूनिट्स की संख्या बदल सकती है। इसका फायदा यह है कि अगर आपके घर का खर्च हर महीने करीब एक तय रकम से चलता है, तो आपको मिलने वाला कैश फ्लो ज्यादा अनुमानित रहता है। बाकी पैसा निवेशित बना रह सकता है।

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SUR में रकम नहीं, यूनिट्स की संख्या तय होती है

वहीं SUR में कहानी उलटी है। यहां आप यह तय करते हैं कि हर महीने कितनी यूनिट्स बेचनी हैं, न कि कितने रुपये निकालने हैं। मान लीजिए आपने हर महीने 5,000 यूनिट्स बेचने का फैसला किया। अगर उस समय एक यूनिट की NAV 10 रुपये है, तो आपको मिलेंगे 50,000 रुपये। अगर NAV बढ़कर 12 रुपये हो गई, तो 5,000 यूनिट्स बेचने पर आपको 60,000 रुपये मिलेंगे। लेकिन अगर बाजार गिरा और NAV घटकर 8 रुपये रह गई, तो वही 5,000 यूनिट्स बेचने पर आपके खाते में सिर्फ 40,000 रुपये आएंगे। यानी SUR = हर बार बेची जाने वाली यूनिट्स तय, लेकिन मिलने वाली रकम बाजार के हिसाब से बदल सकती है।

बाजार गिरने पर SLW और SUR में क्या फर्क पड़ेगा?

यही वह हिस्सा है जिसे रिटायरमेंट प्लानिंग करते समय नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। मान लीजिए रिटायर होने के तुरंत बाद शेयर बाजार में बड़ी गिरावट आ गई। SLW में अगर आपने हर महीने 50,000 रुपये निकालने का फैसला किया है, तो बाजार गिरने के बावजूद आपको इतनी ही रकम निकालनी होगी। कम NAV के कारण इस रकम को जुटाने के लिए ज्यादा यूनिट्स बेचनी पड़ेंगी। अगर बाजार की कमजोरी लंबे समय तक बनी रहती है, तो ज्यादा यूनिट्स की बिक्री आपके बचे हुए कॉर्पस पर अतिरिक्त दबाव डाल सकती है।

दूसरी तरफ, SUR में आप हर महीने तय संख्या में यूनिट्स बेचेंगे। इसलिए बाजार गिरने पर सिर्फ 50,000 रुपये बनाए रखने के लिए अतिरिक्त यूनिट्स बेचने की जरूरत नहीं होगी। लेकिन इसका दूसरा पहलू भी है कि बाजार गिरने पर आपकी मासिक आय कम हो जाएगी। इसलिए कोई एक विकल्प पूरी तरह जोखिम-मुक्त नहीं है। SLW में बाजार गिरने का असर ज्यादा यूनिट्स बेचने के रूप में दिख सकता है, जबकि SUR में इसका असर आपके हाथ में आने वाली कम रकम के रूप में दिखता है।

आपके लिए SLW बेहतर या SUR? पहले अपनी जरूरत समझें

कौन सा विकल्प बेहतर है, इसका जवाब हर व्यक्ति के लिए अलग हो सकता है। सबसे पहले यह देखना जरूरी है कि रिटायरमेंट के बाद आपकी नियमित आय के दूसरे स्रोत क्या हैं। अगर NPS से मिलने वाली रकम से ही राशन, बिजली-पानी, दवाइयों और दूसरे जरूरी खर्चों का बड़ा हिस्सा पूरा होना है, तो हर महीने तय रकम पाने वाला SLW ज्यादा सुविधाजनक लग सकता है। वहीं, अगर आपके पास पहले से पेंशन, किराये की आमदनी या कोई दूसरी नियमित आय है, तो SUR में मिलने वाली घटती-बढ़ती रकम को संभालना अपेक्षाकृत आसान हो सकता है। एक और जरूरी बात है इमरजेंसी फंड। रिटायरमेंट के बाद कुछ महीनों के जरूरी खर्च के बराबर पैसा अलग और आसानी से उपलब्ध रखना मददगार हो सकता है। इससे बाजार में अचानक गिरावट आने पर NPS से मिलने वाली रकम कम होने के बावजूद रोजमर्रा के खर्च प्रभावित नहीं होंगे।

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NPS से कितना पैसा निकाल सकते हैं?

यह फैसला सिर्फ आपकी इच्छा पर निर्भर नहीं करता। NPS से बाहर निकलते समय आपके NPS मॉडल, कॉर्पस और उस समय लागू PFRDA के नियमों के आधार पर यह तय होता है कि कितनी राशि एकमुश्त निकाली जा सकती है और कितनी राशि का इस्तेमाल एन्युटी के लिए करना होगा। उदाहरण के तौर पर, ऑल सिटिजन मॉडल में सामान्य निकासी के तहत लागू नियमों के अनुसार पात्र कॉर्पस के एक हिस्से को एकमुश्त या अनुमत निकासी विकल्पों के जरिए लिया जा सकता है, जबकि कम से कम एक हिस्सा एन्युटी के लिए रखना होता है। छोटे कॉर्पस के लिए अलग प्रावधान भी हो सकते हैं। इसलिए रिटायरमेंट के समय निकासी शुरू करने से पहले अपने NPS खाते पर लागू मौजूदा नियमों की जांच करना जरूरी है।

(Disclaimer: यह आर्टिकल सिर्फ जानकारी के लिए है, न कि निवेश की सलाह है। यह ET NOW Swadesh के निजी विचार भी नहीं हैं। अपने पाठकों और दर्शकों को ET NOW Swadesh पैसों से जुड़ा कोई भी फैसला लेने से पहले अपने वित्तीय सलाहकारों से सलाह लेने का सुझाव देता है। )

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